स्मार्ट सिटी के नाम पर देशभर में ₹1.64 लाख करोड़ का मायाजाल; मिशन खत्म होने के बाद भी 8,047 करोड़ रुपए के 259 प्रोजेक्ट्स अधूरे

रायपुर,नई दिल्ली। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत देश के 100 शहरों को आधुनिक बनाने के सरकारी दावों के पीछे छिपा सच अब आधिकारिक रूप से सामने आ गया है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता एवं छत्तीसगढ़ श्रम कल्याण मंडल के पूर्व सदस्य मनोज सिंह ठाकुर द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act 2005) के तहत भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA), नई दिल्ली से प्राप्त प्रमाणित दस्तावेजों में देशव्यापी स्तर पर बड़े पैमाने पर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताएं उजागर हुई हैं।
मंत्रालय के स्मार्ट सिटी मिशन डिवीजन द्वारा जारी आधिकारिक पत्र (क्रमांक: No. K-15015/1/RTI/2026-SC-I/9210416, दिनांक: 12 अक्टूबर 2026) और संलग्न उपयोगिता प्रमाण-पत्रों (GFR-12C) व Annexure-II के अनुसार, स्मार्ट सिटी मिशन की आधिकारिक अंतिम समय-सीमा 31 मार्च 2025 को ही समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद देश भर में अरबों रुपये के प्रोजेक्ट्स आज भी अधूरे लटके हुए हैं।
1. राष्ट्रीय स्तर पर ₹8,047 करोड़ के 259 प्रोजेक्ट्स लटके
अधिवक्ता मनोज सिंह ठाकुर द्वारा निकाले गए दस्तावेजों के अनुसार:
कुल स्वीकृत प्रोजेक्ट्स व लागत: देश के 100 स्मार्ट शहरों में कुल 8,064 प्रोजेक्ट्स स्वीकृत किए गए, जिनकी कुल अनुमानित लागत ₹1,64,811 करोड़ है।
पूर्ण कार्य का दावा: सरकारी रिकॉर्ड में 7,805 प्रोजेक्ट्स (लागत ₹1,56,764 करोड़) पूर्ण दर्ज हैं।
समय-सीमा खत्म, फिर भी अधूरे: मिशन समाप्त होने के बावजूद देश भर में ₹8,047 करोड़ की लागत वाले 259 प्रोजेक्ट्स अब भी अधूरे (At Implementation Stage) पड़े हुए हैं।
2. शीर्ष 15 शहरों में ₹4,497 करोड़ के काम अधूरे (Annexure-II का आधिकारिक ब्योरा)
मंत्रालय द्वारा जारी सूची के अनुसार देश के शीर्ष 15 शहरों में ही कुल लंबित राशि का 55% से अधिक अटका हुआ है:
कल्याण-डोंबिवली: 3 प्रोजेक्ट्स — ₹523 करोड़
पोर्ट ब्लेयर: 9 प्रोजेक्ट्स — ₹439 करोड़
तिरुपति: 12 प्रोजेक्ट्स — ₹433 करोड़
सिलवासा: 15 प्रोजेक्ट्स — ₹421 करोड़
करनाल: 11 प्रोजेक्ट्स — ₹401 करोड़
ठाणे: 2 प्रोजेक्ट्स — ₹310 करोड़
ग्रेटर वारंगल: 16 प्रोजेक्ट्स — ₹302 करोड़
कवरत्ती: 4 प्रोजेक्ट्स — ₹278 करोड़
पुडुचेरी: 10 प्रोजेक्ट्स — ₹267 करोड़
देहरादून: 1 प्रोजेक्ट — ₹204 करोड़
बिहारशरीफ: 4 प्रोजेक्ट्स — ₹197 करोड़
आइज़ोल: 10 प्रोजेक्ट्स — ₹190 करोड़
नागपुर: 7 प्रोजेक्ट्स — ₹180 करोड़
काकीनाडा: 12 प्रोजेक्ट्स — ₹177 करोड़
सागर: 2 प्रोजेक्ट्स — ₹175 करोड़
(इसके अलावा छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 8 प्रोजेक्ट्स (₹161 करोड़) और राजधानी रायपुर में 3 प्रोजेक्ट्स (₹27 करोड़) के काम मिशन की अंतिम तिथि बीतने के बाद भी अधूरे दर्शाए गए हैं।)
3. रायपुर स्मार्ट सिटी: ₹1.82 करोड़ का फंड डायवर्जन और ₹37 करोड़ की कटौती
अधिवक्ता मनोज सिंह ठाकुर ने दस्तावेजों के आधार पर रायपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड (RSCL) के वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
प्रोजेक्ट फंड से प्रशासनिक खर्च में उधारी (Fund Diversion): रायपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के CFO एवं MD/CEO द्वारा 12 जनवरी 2026 को हस्ताक्षरित उपयोगिता प्रमाण-पत्र (GFR-12C, A&OE) में यह स्पष्ट लिखित स्वीकारोक्ति है कि कार्यालयीन एवं प्रशासनिक खर्च (A&OE) के लिए निर्धारित ₹23.125 करोड़ के अतिरिक्त ₹1.825 करोड़ प्रोजेक्ट फंड (विकास कार्यों के पैसे) से उधार लेकर (Borrowed Fund) प्रशासनिक मद में खर्च किए गए। विकास कार्यों के पैसे को प्रशासनिक मद में मोड़ना वित्तीय नियमों का उल्लंघन है।
रायपुर के साथ वित्तीय भेदभाव: आरटीआई के बिंदु 1 के अनुसार, जबलपुर, इंदौर, भुवनेश्वर और नागपुर को केंद्र से पूरे ₹490-₹490 करोड़ जारी किए गए, जबकि रायपुर को केवल ₹453 करोड़ ही मिले। लगभग ₹37 करोड़ की इस कटौती का ठोस कारण सामने नहीं रखा गया है।
4. केंद्र सरकार का रुख: “मिशन समाप्त, स्थानीय SPV से पूछें”
आरटीआई के बिंदु 2 व 5 के जवाब में केंद्रीय मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि मिशन 31 मार्च 2025 को समाप्त हो चुका है। फंड डायवर्जन या नियमों के उल्लंघन की शिकायतों पर मंत्रालय ने ‘Nil’ दर्शाते हुए पूरी जिम्मेदारी स्थानीय राज्य सरकारों और संबंधित स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) पर डाल दी है।
अधिवक्ता मनोज सिंह ठाकुर का आधिकारिक वक्तव्य:
> “जब पूरे देश में स्मार्ट सिटी मिशन की आधिकारिक मियाद 31 मार्च 2025 को ही समाप्त हो चुकी है, तो जनता की गाढ़ी कमाई के ₹8,047 करोड़ के 259 प्रोजेक्ट्स आज भी अधूरे क्यों हैं? रायपुर में विकास कार्यों का पैसा प्रशासनिक खर्च में ‘उधार’ के नाम पर क्यों खपाया गया? यह पूरा मामला जनता के पैसे के भारी दुरुपयोग का संकेत देता है। हम मांग करते हैं कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और केंद्रीय जांच एजेंसियां इसकी फॉरेंसिक जांच करें। यदि शीघ्र जांच शुरू नहीं हुई, तो जनहित में उच्च न्यायालय में याचिका (PIL) दायर की जाएगी।”