रथ यात्रा 2026: भगवान जगन्नाथ का भक्तों से मिलन, आस्था का महासागर

नई दिल्ली। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को ओडिशा की पवित्र तीर्थनगरी पुरी में दिव्य घटना घटती है। इस दिन यहां भगवान जगन्नाथ का भक्तों से मिलन का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। भगवान जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा सहित अपने रत्न सिंहासन से बाहर निकलकर विशाल रथों पर सवार हो भक्तों के बीच आते हैं। लाखों श्रद्धालु “जय जगन्नाथ” के जयकारों से वातावरण को गुंजायमान बनाते हुए इन रथों को अपनी भक्ति की शक्ति से खींचते हैं। इसलिए इस दिव्य दिन को आस्था का महासागर भी कहा जाता है।
यह महोत्सव केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं, बल्कि ईश्वर और मनुष्य के बीच प्रेम का जीवंत प्रतीक है— जहां भक्त भगवान के द्वार पर नहीं, बल्कि भगवान खुद रथ पर सवार होकर भक्तों के पास आते हैं। इस बार यह रथ यात्रा आज गुरुवार 16 जुलाई को शुरू होकर 24 जुलाई तक चलेगी। इन नौ दिनों में ओडिशा का पुरी आध्यात्मिकता, भक्ति और सनातन संस्कृति का जीवंत केंद्र बन जाएगा।
इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “पवित्र रथयात्रा के शुभ अवसर पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। यह भारत की सदियों पुरानी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की एक अनूठी अभिव्यक्ति है। रथयात्रा से जुड़ी परंपराओं ने भारत और दुनिया भर में कई पीढ़ियों को प्रेरित किया है। ये परंपराएं विनम्रता, सामूहिक भागीदारी और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक हैं।”
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रथ यात्रा का महत्व
जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया के सबसे प्राचीन, सबसे बड़े और सबसे भावपूर्ण त्योहारों में से एक है। इसका इतिहास एक हजार वर्ष से भी पुराना है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वे मंदिर की चार दीवारियों में कैद नहीं रहते। भगवान जगन्नाथ (भगवान विष्णु का रूप), बलभद्र और सुभद्रा साल में एक बार अपने भक्तों से सीधे मिलने के लिए गुंडिचा मंदिर (अपनी मौसी के घर) की यात्रा करते हैं।इस यात्रा का सबसे गहरा संदेश समता और समावेश का है। इसलिए इस रथ यात्रा को सनातन परंपरा का अभिन्न अंग भी कहा जाता है। इस यात्रा के दौरान सभी वर्ग के लोग बिना किसी भेदभाव के भगवान के दर्शन करते हैं। यह उत्सव समता का संदेश देता है — राजा से लेकर आम भक्त तक सब रथ खींचने में समान रूप से भाग लेते हैं। रथ यात्रा का मुख्य उद्देश्य भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को मुख्य मंदिर से गुंडिचा मंदिर (मौसी का घर) तक ले जाना है, जहां वे सात दिन रहकर वापस लौटते हैं।
1. गुंडिचा मंदिर की कहानी (मौसी का घर) : सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, देवी सुभद्रा ने अपनी बुआ (गुंडिचा) के घर जाने की इच्छा प्रकट की। भगवान जगन्नाथ और बलभद्र ने उनकी इच्छा पूरी करने के लिए रथ यात्रा की। यह कथा स्कंद पुराण और स्थानीय परंपराओं में वर्णित है। यही प्रतीकात्मक यात्रा हर साल दोहराई जाती है। देवता सात दिन तक गुंडिचा मंदिर में रहकर फिर बहुड़ा यात्रा के रूप में वापस लौटते हैं।
2. वृंदावन और कृष्ण की याद: एक अन्य मान्यता गौड़ीय वैष्णव परंपरा से जुड़ी है। गौड़ीय वैष्णव परंपरा और ISKCON के अनुसार, यह यात्रा भगवान कृष्ण की वृंदावन लीला और गोपियों के प्रेम से प्रेरित मानी जाती है। कुरुक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र में गोपियों ने कृष्ण को शाही रूप में नहीं, बल्कि वृंदावन के सांवले घनश्याम के रूप में वापस लाना चाहा। भक्तों की असीम प्रेम-भक्ति ने रथ को खींचा और कृष्ण को उनके प्रेम-धाम की ओर ले गई। रथ यात्रा उसी दिव्य प्रेम और विरह-मिलन की कहानी को जीवंत करती है।
3. भक्त सालबेगा की कथा: 17वीं शताब्दी के भक्त कवि सालबेगा (मुस्लिम पिता और हिंदू मां की संतान) जगन्नाथ भक्ति के प्रतीक हैं। उनकी गहरी भक्ति के कारण रथ उनकी समाधि के पास रुकता है। यह घटना धार्मिक सद्भाव का उदाहरण है और श्री जगन्नाथ मंदिर की परंपरा में सम्मिलित है।
4. मानवीय स्पर्श वाली कथा: एक कथा यह भी प्रचलित है कि देवा स्नान पूर्णिमा के बाद देवता “बीमार” पड़ जाते हैं। कुछ दिनों तक वे आराम करते हैं, उनकी सेवा ठीक उसी तरह की जाती है जैसे परिवार के सदस्य की की जाती है। फिर वे मौसी के घर जाते हैं। यह कथा ईश्वर को इतना निकट और मानवीय बना देती है कि भक्त उन्हें अपना ही समझने लगते हैं।
प्रमुख रस्में
– पहांडी बिजे: देवताओं को मंदिर से बाहर लाने की भावपूर्ण रस्म, जिसमें घंटे, शंख और मंत्रों की धुन के साथ वे झूमते हुए आगे बढ़ते हैं।
– चेरा पहरा: पुरी के गजपति महाराजा सोने की झाड़ू से रथ की सफाई करते हैं। यह दर्शाता है कि भगवान के सामने राजा भी सेवक है।
– गुंडिचा यात्रा: देवताओं का मौसी के घर जाना।बहुड़ा यात्रा: वापसी यात्रा।सुना बेषा: स्वर्ण आभूषणों से सजावट।
– नीलाद्रि बिजे: मंदिर वापसी की अंतिम रस्म।
रथों का निर्माण और विशेषताएं
जगन्नाथ रथ यात्रा के तीन रथ हर वर्ष नए बनाए जाते हैं। अक्षय तृतीया से शुरू होकर दो महीने तक काम चलता है। लकड़ी दासपल्ला क्षेत्र के विशेष वृक्षों (फस्सी, धौसा इत्यादि) से ली जाती है। बढ़ई (दरुण) परिवारों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह कार्य किया जाता है।
– नंदीघोष — भगवान जगन्नाथ का रथ (लगभग 45 फीट ऊंचा, 16 पहिए, लाल-पीला रंग)।
– तालध्वज — भगवान बलभद्र का रथ (लगभग 44 फीट ऊंचा, 14 पहिए, लाल-हरा रंग)।
– दर्पदलन — देवी सुभद्रा का रथ (लगभग 43 फीट ऊंचा, 12 पहिए, लाल-काला रंग)।
रथों पर लकड़ी के घोड़े लगाए जाते हैं और पारंपरिक सजावट की जाती है।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयाम
रथ यात्रा ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को विश्व पटल पर ले जाती है। इसमें महाप्रसाद, पारंपरिक संगीत, भजन और कला (जैसे पट्टचित्र, अप्लिक वर्क) सम्मिलित होते हैं। यह उत्सव भक्ति को लोकतंत्र से जोड़ता है और सभी को समान अवसर प्रदान करता है। इस वर्ष 2026 की रथ यात्रा में भी यही परंपराएं निभाई जाएंगी। इस यात्रा का गहरा आध्यात्मिक महत्व है और कई लोगों का मानना ​​है कि रथों या उन्हें खींचने वाली रस्सियों को छूने मात्र से ही ईश्वरीय कृपा मिलती है और उनके जीवन के कष्ट मिट जाते हैं।