संपादकीय

संपादकीय (130)

एचआईवी से संबंधित कलंक महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक तीव्रता से प्रभावित करता है, उन्हें उपचार, सूचना और रोकथाम सेवाओं तक पहुंचने से रोकता है। सामाजिक बुराइयों का निर्माण महिलाओं के बीच अधिक से अधिक कलंक पैदा करता है क्योंकि एचआईवी अनैतिक व्यवहार से जुड़ा हुआ है, जैसे कि सेक्स वर्क। संपत्ति के अधिकार, निवास और देखभाल सुविधाओं के नियंत्रण जैसे मुद्दे एकल और विधवा महिलाओं का सामना करते हैं। एचआईवी और एड्स के साथ जुड़े कलंक और भेदभाव संक्रमण के आगे प्रसार को रोकने और देखभाल, सहायता और उपचार सेवाओं के लिए आवश्यक पहुंच को रोकने में एक महान अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं जो लोगों को एचआईवी / एड्स के साथ उत्पादक जीवन जीने की अनुमति देते हैं। एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव की घटनाएं हमारे समाज में प्रचलित हैं और सरकार द्वारा किए गए प्रयासों के बावजूद, वे अभी भी अक्सर गुप्त रूप से बढ़ रहे हैं। बड़ी संख्या में बच्चे अपनी मां से या तो गर्भावस्था के दौरान या बच्चे के जन्म के दौरान संक्रमित होते हैं और उनमें से कुछ दूषित रक्त या उसके उत्पादों के संक्रमण से संक्रमित होते हैं। असुरक्षित हेट्रोसेक्सुअल संपर्क मुख्य मार्ग यानी 87 प्रतिशत एचआईवी संक्रमण का होना जारी है। सी क्रम में जो सबसे बेहतरीन और कारगर उपचार सामने आए हैं, उनमें से एक है - महिला कंडोम के उपयोग को लोकप्रिय बनाने के लिए एक विशेष अभियान होना चाहिए और इन्हें विशेष रूप से उच्च प्रसार वाले राज्यों में आशा के माध्यम से मुफ्त में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इससे महिला कंडोम की आसानी से उपलब्धता हो जाएगी और महिलाएं इन्हें खरीदने और इस्तेमाल करने में हिचकिचाएंगी नहीं।

एंटी-रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट (एआरटी) ने एचआईवी / एड्स के प्रति जनता के रवैये को बदल दिया है क्योंकि इस बीमारी को अब एक पुरानी प्रबंधनीय बीमारी के रूप में देखा जाता है। यह शरीर से वायरस को खत्म नहीं कर सकता है लेकिन यह रुग्णता और मृत्यु दर को काफी कम कर देता है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है। महिलाओं सहित कई एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति, जो अन्यथा अपनी एचआईवी स्थिति को छिपा रहे थे, अब निदान और उपचार के लिए आगे आ रहे हैं। जब एड्स के साथ  जी रहे लोगों को देखभाल प्रदान करने की बात आती है तो महिलाएं 70 प्रतिशत से अधिक देखभाल करने वाली होती हैं। यह चिंता का विषय है कि लगभग 20 प्रतिशत देखभाल करने वाले स्वयं एचआईवी पॉजिटिव हैं। उन्हें स्थायी आजीविका के लिए सामाजिक सुरक्षा जाल और साधनों की भी आवश्यकता है। बीमारी के परिणामस्वरूप आय में कमी या कमाई करने वाले सदस्य की मृत्यु के साथ, महिलाओं को अपने परिवार को अक्सर समर्थन करना पड़ता है जो भी वे कर सकते हैं। इसमें कम भुगतान किए गए अकुशल कार्य करना या परिवार की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सेक्स कार्य में धकेल दिया जाना शामिल हो सकता है। पारिवारिक आय और रोजगार के अवसरों की कमी के कारण एड्स के साथ  जी रहे लोगों की समस्याएं जटिल हैं। इसलिए उच्च प्रचलित राज्यों में प्रत्येक सामुदायिक देखभाल केंद्र में व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए ताकि विशेष रूप से महिलाएं आय सृजन के लिए व्यावहारिक कौशल प्राप्त कर सकें। पीपीसीटी के तहत गर्भवती महिलाओं की कम कवरेज मुख्य रूप से उत्तरी भारत में बड़ी संख्या में होम डिलीवरी, लेबर रूम में आपातकालीन मामलों और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के साथ सीमित एकीकरण के कारण है। आशा और एएनएम जैसे अन्य ग्रास रूट पदाधिकारियों जैसे स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को विशेष रूप से गर्भावस्था के दौरान एचआईवी के लिए गर्भवती महिला की जांच के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

अक्सर महिला को अपने पति या बच्चे के एचआईवी संक्रमण से जुड़ी बीमारी के लिए दोषी ठहराया जाता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, एड्स के कारण अपने पति की मृत्यु के परिणामस्वरूप विधवा होने वाली नब्बे प्रतिशत महिलाएं अपने वैवाहिक घर में रहना बंद कर चुकी हैं। एचआईवी / एड्स के साथ रहने वाली महिलाओं को आमतौर पर अपने पति की संपत्ति की विरासत और उनके बच्चे की हिरासत से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है। छत्तीसगढ़, पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात राज्यों में लीगल एड सेल्स, बार एसोसिएशन या लीगल एड क्लीनिक के माध्यम से एचआईवी संक्रमण से पीड़ित लोगों को कानूनी सहायता प्रदान की जा रही है। अन्य राज्य सरकारों को भी इसका पालन करने और अपने कानूनी विभागों को एचआईवी संक्रमण से पीड़ित लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए विशेष कानूनी प्रकोष्ठ स्थापित करने के निर्देश देना चाहिए।

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जी हा अपने बिल्कुल सही सुना शुगर की समस्या से हमेशा हमेशा के लिये छुटकारा पाने के लिए अब नहीं खानी पड़ेंगी जीवन भर अँग्रेजी दवाईया।
दोस्तो आज हमारा यह ब्लॉग लिखना का सिर्फ एक ही मकसद है के हम भी इस नेक कार्य मे अपना योगदान दे कर अपने भारत देश को डायबिटीज़ मुक्त देश बना सके।
इस रिपोर्ट के जरिये आज हम आपको रुबुरु करवाएंगे भारत मे चल रहे मधुमेह के एक मुख्य अभियान के बारे मे।
सालो से पीड़ित मधुमेह के रोग से कोई कैसे एक छोटी सी जड़ीबूटी से हमेशा हमेशा के लिए छुटकारा पा सकता है? यह कैसे संभव है? क्या सच मे अफ्रीका के जंगलो मे एक ऐसी जड़ी बूटी की खोज हुयी है, जो की डायबिटीज़ के पेशंट को पूरी तरह से स्वस्थ कर सकती है?
रिपोर्ट के अनुसार इस जड़ीबूटी का असर इतना प्रभावशाली है के जिन लोगो ने इसका सेवन किया है उनके उनुसर उनकी सालो की शुगर की समस्या मात्र एक साल मे हमेशा के लिये खतम हो गयी और उन्हे अँग्रेजी दवाइयो और इंसुलिन के इंजेकशनो से हमेशा हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया।
आये जाने कुछ ऐसे ही लोगो का अनुभव जिनका मानना है के हर्बलमधुनाशनी ने उन्हे डायबिटीज़ मुक्त एक नया जीवन प्रदान किया है।weird trees dragon tree 9 228x300

इस जड़ीबूटी मे ऐसा कोन कोन से खास रसायन है जिसके सेवन से शुगर के पेशंट का शुगर लेवेल बिल्कुल नॉर्मल हो जाता है?

कंपनी के मुताबिक इस जड़ीबूटी मे कुदरती तोर से ऐसे रसायन पाये गए है जो मधुमेह के रोगी के पैंक्रियास नामक अंग को दुबारा से स्वस्थ करता है। इस जड़ीबूटी को जैसे ही हम रात भर पानी डाल कर छोड़ देते है इसका सत पानी मे घुल जाता है और उस पानी का दिन मे दो बार सेवन करने से हमारे शरीर मे pancreas नामक अंग धीरे धीरे स्वस्थ होने लगता है और उचित मात्रा मे दुबारा से इंसुलिन बनाने लगता है। जिससे मधुमेह के रोगी का शुगर लेवेल बिलकुल नॉर्मल हो जाता है।
आज के समय मे ऐसे कई प्रॉडक्ट मार्केट मे बिकते है जो लोगो को बेवकूफ बनाते है। और बहुत सी कंपनीया अपने प्रॉडक्ट को लेकर बड़े बड़े दावे करती है और यह दावे जनता की उम्मीद पर खरे नहीं उतरते।
यकीन मानिये कंपनी से बात करने के बाद भी, हम भी अभी तक इस बात पर पूरी तरह से यकीन नहीं कर पा रहे थे, के सच मे कोई ऐसे पेड़ की खोज हुयी है के जिसकी लकड़ी का केवल पानी पीने से ही मधुमेह का रोगी बिलकुल रोगमुक्त हो सकता है और शुगर जैसी खतरनाक बीमारी से हमेशा हमेशा के लिये छुटकारा पा सकता है।
इसलिए अपने यकीन को ओर पक्का करने के लिये हमने उन लोगो से मिलने का फैसला किया जो लोग इस जड़ीबूटी का इस्तेमाल कर रहे थे और रोजाना हमे ईमेल भेज रहे थे के हम इस सच्चाई को जनता तक पहुंचाये।
खोज को आगे बड़ाते हुवे हमारी रिसर्च टीम देश के अलग अलग शहरों मे उन लोगो से मिलने पहुंची जो लोग इस बात का दावा कर रहे थे के हर्बलमधुनाशनी जड़ीबूटी का इस्तेमाल करके उन्हे डायबिटीज़ जैसी खतरनाक बीमारी से हमेशा हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया। और यकीन मानिये हमारी टीम को उस समय बहुत ही आश्चर्ये हुवा जब उन्हे पता चला के बहुत से बॉलीवुड स्टार भी अपनी डायबिटीज़ की समस्या के लिए इसी हर्बलमधुनाशनी प्रॉडक्ट का इस्तेमाल कर रहे है।

डॉक्टर दत्ता द्वारा खोजा गया अफ्रीका के जंगल हर्बलमधुनाशनी का पेड़।

एक साल की रिसर्च के बाद डॉ दत्ता के सामने जो नतीजे आए उन्हे देख कर डॉ दत्ता खुशी से छूम उठे। क्यी सालो की डॉ दत्ता की मेहनत सच मे रंग लायी। डॉ दत्ता को सच मे एक ऐसे पेड़ के बारे मे पता चल चुका था जिसकी लकड़ी मे ऐसे ओषधिये गुण थे जो के शुगर के पेशंट को पूरी तरह से स्वस्थ कर सकती है।

रिसर्च की Positive नतीजो के तुरंत बाद ही डॉ दत्ता ने इस जड़ीबूटी को लोगो तक पहुंचाने के लिए एक सही कंपनी का चुनाव किया जो की डॉ दत्ता के इस नेक कार्य उनका साथ देना चाहती थी। कंपनी और डॉ दत्ता ने इस जड़ीबूटी को नाम दिया हर्बलमधुनाशनी यानि के मधुमेह का नाश करने वाली।

 

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हमारा संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य में गठित करने का संकल्प है। यह वास्तव में, लोगों को सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक न्याय, स्वतंत्रता और समानता हासिल करने के लिए एक वादा है; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता; स्थिति और अवसर की समानता; और सभी के बीच बढ़ावा देने के लिए - बिरादरी, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता का आश्वासन देती है। डॉ बी आर अम्बेडकर ने विभिन्न प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करते हुए मुख्य अपेक्षाओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। उन्होंने कहा:"संविधान को तैयार करने में हमारी दोहरी प्राथमिकता है: राजनीतिक लोकतंत्र के रूप में, और यह बताने के लिए कि हमारा आदर्श आर्थिक लोकतंत्र है और यह भी बताना है कि जो भी सरकार सत्ता में है, उसे यह लाने का प्रयास करना चाहिए।" भारत का संविधान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र के लिए एक संरचना तैयार करता है। यह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीकों से विभिन्न राष्ट्रीय लक्ष्यों को सुनिश्चित करने और प्राप्त करने के लिए भारत के लोगों की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। यह केवल कानूनी पांडुलिपि नहीं है; बल्कि, यह एक ऐसा वाहन है जो समय की बदलती जरूरतों और वास्तविकताओं को समायोजित और अनुकूल करके लोगों के सपनों और आकांक्षाओं को साकार करने के लिए राष्ट्र को सक्षम बनाता है। कानून के समक्ष समानता और कानूनों की समान सुरक्षा संविधान का सार है। साथ ही, संविधान समाज के वंचितों की जरूरतों और चिंताओं के प्रति भी संवेदनशील है। भारत का संविधान भूमि का सर्वोच्च नियम है, जिसके आधार पर संपूर्ण शासन प्रणाली काम करती है। हमारे पूर्वजों ने संसदीय लोकतंत्र को नवजात गणराज्य के लिए शासन प्रणाली के रूप में चुना था। लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली को चुनने का कारण डॉ बी आर अम्बेडकर ने इन शब्दों में स्पष्ट किया था, और कहा:

"... गैर-संसदीय प्रणाली के तहत, जैसे कि संयुक्त राज्य अमेरिका में मौजूद है, कार्यकारी की जिम्मेदारी का आकलन आवधिक है। यह मतदाताओं द्वारा किया जाता है। इंग्लैंड में, जहां संसदीय प्रणाली प्रबल है, जिम्मेदारी का मूल्यांकन कार्यपालिका द्वारा दैनिक और आवधिक दोनों स्तर पर होता है। दैनिक मूल्यांकन संसद सदस्यों द्वारा प्रश्नों, संकल्पों, अविश्वास प्रस्ताव, स्थगन गतियों और अभिभाषणों पर बहस के माध्यम से किया जाता है। आवधिक मूल्यांकन चुनाव के समय मतदाताओं द्वारा किया जाता है। हर पांच साल या उससे पहले भी यह हो सकता है। जिम्मेदारी का दैनिक आकलन, जो अमेरिकी प्रणाली के तहत उपलब्ध नहीं है, यह महसूस किया जाता है, यह आवधिक आकलन की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी है और भारत जैसे देश में कहीं अधिक आवश्यक है।संसदीय प्रणाली की कार्यकारिणी की सिफारिश में अधिक स्थिरता के लिए अधिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी गई है। "

1922 में  महात्मा गांधी ने जोर दिया कि भारत के भाग्य का निर्धारण स्वयं भारतीयों द्वारा किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा: “स्वराज ब्रिटिश संसद का एक स्वतंत्र उपहार नहीं होगा। यह संसद के एक अधिनियम के माध्यम से व्यक्त की गई भारत की पूर्ण आत्म-अभिव्यक्ति की घोषणा होगी। लेकिन यह केवल भारत के लोगों की घोषित इच्छा का एक विनम्र अनुसमर्थन होगा। अनुसमर्थन एक संधि होगी, जिसके लिए ब्रिटेन एक पार्टी होगी। ब्रिटिश संसद, जब समझौता होगा, स्वतंत्र रूप से चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से भारत के लोगों की इच्छाओं की पुष्टि करेगा। महात्मा गांधी की दृष्टि संविधान में आध्यात्मिक रूप से निहित थी, जिसे संविधान की प्रस्तावना में भी पढ़ा जा सकता है।

भारत के संविधान की प्रस्तावना उन मूलभूत मूल्यों, दर्शन और उद्देश्यों को दर्शाती और प्रतिबिंबित करती है जिन पर संविधान आधारित है। संविधान सभा के सदस्य पंडित ठाकुर दास भार्गव ने प्रस्तावना के महत्व को निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया: "प्रस्तावना संविधान का सबसे कीमती हिस्सा है। यह संविधान की आत्मा है। यह संविधान की कुंजी है। ... यह संविधान में स्थापित एक गहना है ... यह एक उचित मापक है जिसके साथ कोई भी संविधान के मूल्य को माप सकता है। "

अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, एक संवैधानिक विशेषज्ञ, जिन्होंने संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उन्होंने कहा:

“भारतीय लोगों के बड़े पैमाने पर अज्ञानता और अशिक्षा के बावजूद, विधानसभा ने आम आदमी में प्रचुर विश्वास और लोकतांत्रिक शासन की अंतिम सफलता और पूर्ण विश्वास में वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाया है। वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकतांत्रिक सरकार की शुरूआत आत्मज्ञान लाएगी और भलाई, जीवन स्तर, आराम और आम आदमी के सभ्य जीवन को बढ़ावा देगी .... यह कहा जा सकता है कि इतिहास में पहले कभी भी इस तरह के प्रयोग इतने साहसपूर्वक किए नहीं गए हैं। ”

महात्मा गांधी ने भारत के नए संविधान की कल्पना भारत के विशिष्ट और विशेष परिस्थितियों के लिए लागू सार्वभौमिक मूल्यों के संदर्भ में की थी। 1931 की शुरुआत में, गांधीजी ने लिखा था:

“मैं एक ऐसे संविधान के लिए प्रयास करूंगा जो भारत को दासता और संरक्षण से मुक्त करेगा। मैं एक ऐसे भारत के लिए काम करूंगा जिसमें सबसे गरीब यह महसूस करेगा कि यह उनका देश है, जिसके निर्माण में उनकी प्रभावी आवाज है: एक ऐसा भारत जिसमें कोई उच्च वर्ग या निम्न वर्ग का व्यक्ति नहीं है, एक ऐसा भारत जिसमें सभी समुदाय सही सामंजस्य से रहेंगे। अस्पृश्यता के अभिशाप के लिए ऐसे भारत में कोई जगह नहीं हो सकती है। हम बाकी दुनिया के साथ  शांति से रहेंगे और न ही शोषण करेंगे और ना ही शोषित होंगे। .... यह मेरे सपनों का भारत है जिसके लिए मैं संघर्ष करूंगा। '

संविधान लोगों को उतना ही सशक्त बनाता है जितना लोग संविधान को सशक्त बनाते हैं। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने बहुत अच्छी तरह से महसूस किया कि एक संविधान, चाहे कितना भी अच्छा लिखा गया हो और कितना ही विस्तृत क्यों न हो, उसे लागू करने और उसके मूल्यों द्वारा जीने के लिए सही लोगों के बिना बहुत कम होगा। और इसमें, उन्होंने आने वाली पीढ़ियों पर अपना विश्वास ज़ाहिर किया। आज हमें गर्व महसूस करने का पूरा अधिकार है, क्योंकि हमारे संविधान को लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के साथ-साथ एक समावेशी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना के लिए दुनिया भर में मान्यता प्राप्त है।

सलिल सरोज
समिति अधिकारी
लोक सभा सचिवालय

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पानी बुनियादी मानवीय आवश्यकता और एक प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है। हालांकि देश में जल संसाधन की बंदोबस्ती स्पष्ट रूप से प्रचुर मात्रा में दिखाई दे सकती है, लेकिन समय के साथ ताजे पानी की उपलब्धता में व्यापक बदलाव हैं। जबकि उत्तर में गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना प्रणाली में लगभग ६०% क्षमता उपलब्ध है और पश्चिमी घाट के उच्च वर्षा क्षेत्र में लगभग ११%, अन्य सभी नदियों में लगभग २ ९% क्षमता उपलब्ध है। महानदी, गोदावरी, कृष्णा और प्रायद्वीपीय क्षेत्र की कावेरी। इसके कारण देश के कुछ हिस्से बाढ़ से पीड़ित हैं और साथ ही अन्य क्षेत्रों में भीषण सूखे का सामना करना पड़ता है। नदियों को जोड़ने की परियोजना को समान वितरण और देश में अधिशेष नदी बेसिन क्षेत्रों से घाटे वाले नदी बेसिन क्षेत्रों तक पानी के इष्टतम उपयोग के विचार के रूप में सोचा गया था। साथ ही, देश की खाद्यान्न आवश्यकता को वर्ष 2050 तक दोगुना करने की संभावना है, ताकि हमारी आबादी के भोजन की आवश्यकता को पूरा किया जा सके। कुछ स्थानों पर बाढ़ के मौसम के दौरान पानी की प्रचुरता और कुछ अन्य स्थानों पर आवर्ती सूखे के रूप में गंभीर जल की कमी ने नदियों को जोड़कर एक लंबी दूरी के अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण परियोजना पर विचार किया, जो एक आकर्षक और सार्थक विकल्प है। जल की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता में राष्ट्रीय असंतुलन को कम करने के लिए भी सिंचित क्षेत्र में वृद्धि करना जिससे बाढ़ और सूखे के कुप्रभाव को कम किया जा सके।

 

पानी की लंबी दूरी के बेसिन हस्तांतरण, हालांकि, एक नई अवधारणा नहीं है और भारत में पांच सदियों से प्रचलन में है। पेरियार परियोजना, परम्बिकुलम अलियार परियोजना, कुर्नूल - कुडप्पा नहर और तेलुगु गंगा परियोजना 19 वीं और 20 वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में निष्पादित अंतर बेसिन जल हस्तांतरण के कुछ अच्छे उदाहरण हैं। इसी तरह, उत्तर भारत में, सिंधु बेसिन और इंदिरा गांधी नाहर प्रियजन में अंतर उप-बेसिन हस्तांतरण कुछ परियोजनाएं हैं जिन्हें सफलतापूर्वक निष्पादित किया गया है। निष्पादन के तहत देश में एक अन्य महत्वपूर्ण अंतर बेसिन जल अंतरण योजना सरदार सरोवर परियोजना है। राष्ट्रीय जल ग्रिड पर एक नोट पहले तत्कालीन केंद्रीय जल और बिजली आयोग (लगभग 1972) द्वारा तैयार किया गया था और अन्य लिंक के साथ गंगा-कावेरी लिंक के लिए तीन संभावित संरेखण को बाहर लाया गया था।

 

इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर की अवधारणा को पहले डॉ के.एल. 1972 में 'नेशनल वाटर ग्रिड' के रूप में राव और 1977 में कैप्टन दस्तूर द्वारा 'गारलैंड कैनाल' के रूप में, जिसने काफी ध्यान आकर्षित किया। डॉ के.एल. राव ने ब्रह्मपुत्र और गंगा लिंक सहित कुछ अन्य लिंक के साथ गंगा-कावेरी लिंक के लिए संरेखण में से एक की वकालत की। 2,640 किमी लंबे गंगा-कावेरी लिंक ने अनिवार्य रूप से एक वर्ष में लगभग 150 दिनों के लिए पटना के पास गंगा के बाढ़ प्रवाह के 1,680 क्यूसेक (60,000 क्यूसेक) की वापसी की परिकल्पना की और 549 मीटर के सिर पर इस पानी के 1,400 क्यूसेक (50,000 क्यूसेक) को पंप किया। (1,800 फीट) प्रायद्वीपीय क्षेत्र में स्थानांतरण के लिए और शेष 280 क्यूमेक (10,000 क्यूसेक) का उपयोग गंगा बेसिन में ही करने के लिए। इस प्रस्ताव में 4 मीटर के अतिरिक्त क्षेत्र में सिंचाई के लिए 2.59 मिलियन हेक्टेयर मीटर गंगा जल के उपयोग की परिकल्पना की गई है। हा। डॉ राव ने कुछ अतिरिक्त लिंक भी प्रस्तावित किए थे, जैसे (ए) ब्रह्मपुत्र-गंगा लिंक 12 से 15 मीटर की लिफ्ट के साथ 1,800 से 3,000 क्यूमेक स्थानांतरित करना; (b) महानदी के 300 क्यूमेक जल को दक्षिण की ओर स्थानांतरित करना; (c) नर्मदा से गुजरात और पश्चिमी राजस्थान तक 275 मीटर की ऊँचाई वाली नहर; और (घ) पूर्व की ओर पश्चिमी घाट की नदियों से लिंक। इस प्रस्ताव में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के तहत बाद में किए गए प्रस्तावों के समान घटक थे।

 

डॉ के.एल. राव के प्रस्ताव में गंगा-कावेरी लिंक के माध्यम से कावेरी तक गंगा के बाढ़ के पानी को स्थानांतरित करने की परिकल्पना की गई थी, आंशिक रूप से लिफ्ट द्वारा और आंशिक रूप से गुरुत्वाकर्षण द्वारा, कैप्टन दस्तूर की अवधारणा हिमालय और मध्य / के माध्यम से नहर में सभी सहायक नदियों / नालों पर पानी का भंडारण करना था। दक्षिणी गारलैंड नहरें जिन्हें दो बिंदुओं (दिल्ली और पटना) में अंतर-जुड़ा होना प्रस्तावित किया गया था। दूसरे शब्दों में, कप्तान दस्तूर का प्रस्ताव पानी को स्टोर करना और दोनों दिशाओं में स्थानांतरण करना है।

 

इन दोनों योजनाओं की जांच केंद्रीय जल आयोग, राज्य सरकारों और आईआईटी और रुड़की विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों के विशेषज्ञों के एक समूह द्वारा की गई थी और तकनीकी रूप से गैर-कानूनी और आर्थिक रूप से निषेधात्मक पाए गए थे। 1979 में केंद्रीय जल आयोग ने संकेत दिया कि दस्तूर प्रस्ताव की लागत लगभग 12 मिलियन करोड़ रुपये थी। इसलिए, योजना को छोड़ दिया गया था। हालांकि, कई लोगों द्वारा दिखाए गए निरंतर हित ने अंतर बेसिन जल अंतरण प्रस्तावों का अध्ययन करने के लिए फिर से प्रोत्साहन दिया।

 

इसके बाद, अगस्त 1980 में जल संसाधन मंत्रालय (तत्कालीन सिंचाई मंत्रालय) ने देश में 'जल संसाधन विकास के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना' तैयार की, जिसमें अधिशेष बेसिनों से घाटे वाले बेसिन में पानी के हस्तांतरण की परिकल्पना की गई थी। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना में दो घटक शामिल हैं, अर्थात। (i) प्रायद्वीपीय नदियाँ विकास, और (ii) हिमालयी नदी विकास। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना ने 25 m.ha के अतिरिक्त लाभ की परिकल्पना की है। सतही जल से सिंचाई, भूजल के बढ़े हुए उपयोग से 10 m.ha, मौजूदा सिंचाई क्षमता को 140 मीटर के मौजूदा स्तर से बढ़ानाऔर बाढ़ नियंत्रण, नेविगेशन, जल आपूर्ति, मत्स्य पालन, लवणता और प्रदूषण नियंत्रण आदि के लाभों के अलावा 34,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन। राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी को पूर्व व्यवहार्यता / व्यवहार्यता अध्ययन को आगे बढ़ाने का काम सौंपा गया था।

 

वर्तमान समय के अनुसार संघ और राज्यों के बीच विषयों का संवैधानिक विभाजन, विषय 'जल' संघ और राज्य सूचियों दोनों के अंतर्गत आता है। यह बताया जा सकता है कि अनुच्छेद 246 के अनुसार सातवीं अनुसूची में संघ सूची की प्रविष्टि 56 में केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों को विनियमित करने और विकसित करने के लिए कानून बनाने का अधिकार है, जो इस तरह के विनियमन और विकास के तहत है। संसद द्वारा संघ के नियंत्रण को सार्वजनिक हित में कानून द्वारा समीचीन घोषित किया जाता है, सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 17 राज्यों को प्रवेश के प्रावधानों के अधीन सिंचाई आदि के लिए पानी को विनियमित करने और विकसित करने के लिए कानून बनाने का अधिकार देती है। संघ सूची के 56। उपरोक्त के अलावा, अनुच्छेद 254 (1) संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और राज्यों के विधायकों द्वारा बनाए गए कानूनों के बीच असंगतता प्रदान करता है, जिस पर संसद कानूनों को लागू करने के लिए सक्षम है या मामलों पर मौजूदा कानून के किसी प्रावधान में सक्षम है। समवर्ती सूची, फिर संसद द्वारा बनाया गया कानून राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून पर उस हद तक लागू होगा, जब तक कि प्रतिहिंसा की सीमा शून्य न हो जाए। लेकिन यह नोट करना निराशाजनक है कि केंद्र सरकार ने अब तक सातवीं अनुसूची के तहत संघ सूची की प्रविष्टि ५६ के प्रावधानों के तहत कोई कानून नहीं बनाया है, हालांकि जल के मुद्दे पर राज्यों के बीच कई विवादों के उदाहरण हैं, न्यायाधिकरणों के फैसले की अवहेलना परियोजनाओं के निष्पादन में परिहार्य देरी आदि के परिणामस्वरूप।

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सलिल सरोज

नई दिल्ली

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 "बुजुर्ग राष्ट्र की एक बहुमूल्य संपत्ति होते हैं जो जीवन के संचित ज्ञान का भंडार होते हैं। अनुभव के आधार पर, वे समाज को जीवन प्रदान करते हैं। बढ़ी हुई जीवन प्रत्याशा के साथ, अनुभवजन्य अध्ययन से पता चलता है कि युवा जनसांख्यिकीय जनसांख्यिकीय, जिसे जनसांख्यिकीय लाभांश माना जाता है, एक जेरोन्टोलॉजिकल उभार में बदल जाएगा क्योंकि वर्ष 2050 तक 60 + और 80+ लोगों की आबादी क्रमशः 326% और 700% बढ़ जाएगी। इसके अलावा, तेजी से बदल रहा सामाजिक मैट्रिक्स तेजी से बड़ों की देखभाल, गरिमा और स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। यह कठोर व्यावहारिक और नीतिगत हस्तक्षेपों के लिए कहता है और निश्चित रूप से, बढ़ा-चढ़ाकर आवंटन आवंटित करता है। "

 Read Also:महिला सुरक्षा और उनके अधिकारो के प्रति राज्य सरकार सजग,अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक ने की प्रकरणों की सुनवाई

बुजुर्ग लोग एक राष्ट्र की एक बहुमूल्य संपत्ति हैं जिन्हें समृद्ध अनुभव और ज्ञान का भंडार माना जाता है। वे समाज को अनुभव प्रदान करते हैं और बड़ों के रूप में ज्ञान और संचित ज्ञान का कार्य करते हैं। बाल अस्तित्व में सुधार और छोटे पारिवारिक मानदंडों को अपनाने और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि के साथ, भारत सहित दुनिया की आबादी में जनसांख्यिकीय परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण विशेषता बुजुर्ग व्यक्तियों की संख्या में प्रगतिशील वृद्धि है। विश्व जनसंख्या की यह उम्र बढ़ने सरकारों को यह सुनिश्चित करने के लिए एक अद्वितीय चुनौती का प्रतिनिधित्व करती है कि वृद्ध और उनकी मानव संसाधन क्षमता की आवश्यकताओं को उपयुक्त प्रोग्रामेटिक और नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से पर्याप्त रूप से संबोधित किया जाता है।

 

वयोवृद्ध व्यक्तियों की स्थिति को पहली बार 1982 में वियना में एजिंग पर विश्व असेंबली में उजागर किया गया था जिसमें एजिंग पर अंतर्राष्ट्रीय कार्य योजना को अपनाया गया था। यह उम्र बढ़ने पर नीतियों और कार्यक्रमों के विकास के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय ब्लू प्रिंट के रूप में कार्य करता है। बाद में, 16 दिसंबर, 1991 को महासभा प्रस्ताव 46-91 द्वारा वृद्ध व्यक्तियों के लिए संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों को अपनाया गया। निम्नलिखित पांच सिद्धांत हैं, जिन्हें सरकारों को जहां भी संभव हो राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है: -

 

  • स्वतंत्रता: वृद्ध व्यक्तियों को भोजन, पानी, आश्रय, कपड़े, स्वास्थ्य देखभाल, काम और अन्य आय पैदा करने वाले अवसरों, शिक्षा, प्रशिक्षण और सुरक्षित वातावरण में जीवन की पहुंच होनी चाहिए।
  • भागीदारी: वृद्ध व्यक्तियों को सामुदायिक जीवन में एकीकृत रहना चाहिए और उनकी भलाई को प्रभावित करने वाली नीतियों के निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए।
  • देखभाल: वृद्ध व्यक्तियों की सामाजिक और कानूनी सेवाओं तक और स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच होनी चाहिए ताकि वे शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक कल्याण का एक इष्टतम स्तर बनाए रख सकें। इसमें गरिमा, विश्वास, जरूरतों और गोपनीयता के लिए पूर्ण सम्मान शामिल होना चाहिए।
  • आत्म-पूर्ति: वृद्ध व्यक्तियों की शैक्षिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और मनोरंजन संसाधनों तक पहुँच होनी चाहिए और उनकी पूरी क्षमता विकसित करने में सक्षम होना चाहिए।
  • गरिमा: वृद्ध व्यक्ति गरिमा और सुरक्षा में रहने में सक्षम होना चाहिए, शोषण, शारीरिक या मानसिक से मुक्त होना चाहिए, और उम्र, लिंग और नस्लीय या जातीय पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना उचित व्यवहार किया जाना चाहिए।

 

एजिंग पर दूसरी विश्व सभा 2002 में मैड्रिड में आयोजित की गई थी, जहां मैड्रिड इंटरनेशनल प्लान ऑफ एक्शन ऑन एजिंग (एमआईपीएए), 2002 को अपनाया गया था और महासभा द्वारा समर्थन किया गया था। योजना ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय योजनाओं के विकास को प्रेरित किया है और उम्र बढ़ने पर बातचीत के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय फ्रेम वर्क प्रदान किया है। अंतरराष्ट्रीय फोरम में उठाए जाने से बहुत पहले वृद्ध व्यक्तियों की भलाई भारतीय संविधान में निहित थी। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41 यह कहता है कि "राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमा के भीतर, बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामलों में शिक्षा और सार्वजनिक सहायता के लिए काम करने का अधिकार सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा। , और अंडरस्टैंडर्ड के अन्य मामलों में चाहते हैं "।

 

भारत में वृद्धावस्था जनसंख्या पर संयुक्त राष्ट्र की आपत्ति के अनुसार, जनसांख्यिकीय प्रोफ़ाइल में यह दर्शाया गया है कि वर्ष 2000-2050 में, भारत में कुल जनसंख्या में 55% की वृद्धि होगी, जबकि उनके 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की जनसंख्या में 326% की वृद्धि होगी और सबसे तेजी से बढ़ते समूह - 80% से 80% की आयु वाले लोग।

 

वरिष्ठ नागरिकों के लिए 12 वीं योजना के दस्तावेजों में निम्नलिखित कार्यक्रम / योजनाएँ प्रस्तावित हैं: -

 

(i) माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के रखरखाव और कल्याण के लिए जागरूकता पीढ़ी, 2007।

(ii) राष्ट्रीय और जिला स्तरों पर वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक हेल्पलाइन स्थापित करना।

(iii) वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की स्थापना करना।

(iv) वृद्धों के लिए राष्ट्रीय ट्रस्ट बनाना।

(v) वरिष्ठ नागरिकों पर नई राष्ट्रीय नीति के विभिन्न प्रावधानों के कार्यान्वयन के लिए योजना।

(vi) जिला स्तर पर वरिष्ठ नागरिकों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के लिए ब्यूरो की स्थापना।

(vii) वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्मार्ट पहचान पत्र जारी करना।

(viii) वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य बीमा।

 

इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि सरकार और समुदाय बुजुर्गों की देखभाल करने में एक सक्रिय भूमिका निभाएं। वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा सकारात्मक प्रोग्रामेटिक और नीतिगत हस्तक्षेप और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में पुराने लोगों के लिए निर्धारित प्रशंसनीय लक्ष्यों के प्रगतिशील कार्यान्वयन और हमारे अपने राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में वरिष्ठ नागरिकों को जीवन जीने में सक्षम बनाना होगा। गरिमा और आत्म-पूर्ति की। सरकार को सभी हितधारकों और बड़ों के साथ उचित परामर्श के साथ एक मजबूत एकीकृत कार्य योजना तैयार करनी चाहिए और वरिष्ठ नागरिकों की गंभीर समस्याओं को दूर करने के लिए राष्ट्र की प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए एक निश्चित समय सीमा के साथ ईमानदारी से लागू करना चाहिए। 80+ आयु वर्ग की विशेष जरूरतों और चुनौतियों का समाधान करने के लिए कोई विशिष्ट कार्यक्रम / योजना नहीं है, जिसे अगले 20-30 वर्षों में कई गुना (700%) बढ़ाने का अनुमान है। यह आयु वर्ग सबसे कमजोर है और अपने पुराने वर्षों में मनोभ्रंश, अल्जाइमर रोग, पार्किंसंस रोग, अवसाद, आदि होने का जोखिम चलाता है। सभी संबंधित विभागों के प्रतिनिधियों के एक विशेषज्ञ समूह का गठन 80+ समूह के लिए विशेष स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम तैयार करने के लिए किया जाना चाहिए। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि और लोगों के स्वास्थ्य की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति के साथ, सरकार को वरिष्ठ नागरिकों के लिए 65 वर्ष / या बाद के सेवानिवृत्ति के अवसरों तक रोजगार की निरंतरता को देखने की आवश्यकता है ताकि समाज उनके अनुभव और प्रतिभा पर आकर्षित हो सके। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों को सुरक्षा और सुरक्षा की भावना देने के लिए राज्यों द्वारा प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। भारत सरकार को इन देशों से सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं को अपनाने का प्रयास करना चाहिए और हमारे देश में वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए और इस संबंध में एक विस्तृत अध्ययन सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के एजिंग डिवीजन द्वारा किया जाना चाहिए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय में भारत सरकार बच्चों को महान भारतीय सांस्कृतिक विरासत के बारे में जागरूकता प्रदान करने के लिए उपयुक्त सिलेबस डिज़ाइन कर सकती है और यह सम्मान उस समय से है जब प्राचीन समय से बड़ों का सम्मान किया जाता रहा है और इससे  बड़ों की देखभाल और सेवा के दूरगामी लाभ प्राप्त होते हैं।

 

सलिल सरोज

नई दिल्ली

 

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अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जब कभी होते है तो सबसे बड़ा सवाल हर देश के सामने यही होता है कि नये राष्ट्रपति के आने बाद अमेरिका और उस देश में रिश्ते कैसे रहेगेट्रम्प के राष्ट्रपति रहते हम खूब जानते हे कि रिश्तो में भारत के साथ कैसे उतार चढ़ाव आते रहे लेकिन सवाल है कि जो बाइडन भारत को किस नजर से देखते हैजो बाइडन भारत के लिए कोई नया नाम नहीं है आप जानते है कि वो अमेरिका के पूर्व उप-राष्ट्रपति रह चुके है । साल 2008 में जब वो विदेश संबंध समिती के प्रमुख थे, तब भारत और अमेरिका के बीच जो ऐतिहासिक परमाणु डील हुई थी उस वक्त जो बाइडन में बड़ी भूमिका निभाई थी और इस डील के पक्ष में उन्होंने वोट भी डाला था जो बाइडन ने इस डील के बारे में कहा था कि मेरी अगुवाई में भारत अमेरिका ने ऐतिहासिक डील पर साइन किये थे जिससे दोनों देशोें कि दोस्ती मजबूत हुई थी।और 10 साल और पीछे जाये तो सन् 1998 में जब भारत ने परमाणु परिक्षण किये थे उस वक्त जो बाइडन ने कहा था कि भारत के पक्ष को उन लोगों ने गलत रूप में लिया है भारत कोई नाॅरथ कोरिया या इरान नहीं है। जो इसका गलत इस्तेमाल करेगा हालाकि तब उन्ही कि डेमेके्रटीव सरकार थी और भारत पर प्रतिबंध लगाये गये थे

इसके अलावा अगर बात करें तो जो बाइडन कई बार कह चुके है कि अगर भारत और अमेरिका दोस्त रहेंगे तो दुनिया सुरक्षित रहेगी और इसलिये बाइडन कि ओर से कहा गया था कि दुनिया कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए भारत और अमेरिका कि दोस्ती काफी अहम है। कुछ समय पहले उस अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया था तब जो बाइडन ने एक संदेश जारी करके भारत अमेरिका की दोस्ती की बात दोहराई थी और कहा था कि अगर वो राष्ट्रपति बनते है तो दोनों देशो के रिश्तो को मजबूत बनाने कि ओर काम करेंगेWhatsApp Image 2020 11 10 at 19.36.49

जिसमें व्यापार कि बराबरी मे काम किया जायेगा और जलवायु परिवर्तन समेत दुनिया के अन्य प्रमुख मुद्दों पर भी दोनों देश मिलकर आगे बढ़ेंगे आप जानते है कि व्यापार और जलवायु परिवर्तन पर डोनाल्ड ट्रम्प का क्या स्टैण्ड रहा है और भारत जलवायु परिवर्तन के उनके स्टैण्ड से बहुत खुश भी नहीं है।आप जानते होंगे कि बाइडन का नाता डेमोके्रटिक पार्टी से है। और उनके साथ कमला हैरिस का उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार होना भी भारत को साधने में अहम रह सकता है क्योंकि जो बाइडन कहते रहे है कि पिछले डेमोके्रटिक राष्ट्रपति बाराक ओबामा के कार्यकाल में सबसे अधिक भारतीय मूल के लोगों को सरकार में जगह मिली थी और अब कमला हैरिस उपराष्ट्रपति पद पर आने वाली पहली भारतीय मूल कि महिला होगी और उनके रहते भारत अमेरिका एक दूसरे को और बेहतर समझ सकेंगे।जो बाइडन बहुत से मसलों पर ट्रम्प कि लीग से हटकर भारत के साथ रिशते निभाने कि बात करते आप है फिर वो चाहे एच1बी वीसा कि बात हो जलवायु परिवर्तन के मसले पर पेरिस समझौते में आने का मसला हो या फिर टेªड डील हो। लेकिन राजनीति और विदेष संबंध केवल अच्छी और लुभावनी बातों से नहीं चलते जो बाइडन को लेके कुछ आषाकांय भी है। जो उनके बयानों से साफ जाहिर होती है। जो बाइडन भारत सरकार के कुछ फैेसलो के आलोचक रहे है।

पहल मुद्दा कश्मीर का है जहा हो आर्टिकल 370 को हटाने को सही नहीं मानते और पुरानी स्थिति बहाल करने कि बात कर चुके है।वही दूसरी आलोचना बाइडन की नागरिकता संसोधन अधिनियम या सीएए और एनआरसी को लेकर है भी है। बाइडन ने इसे भारत के धर्मनिरपेक्ष की परिभाशा के विपरीत बताया था कहते है कि जो बाइडन मझे हुए राजनायिक है।वो एक साथ कई दिशाओं को साधने में माहिर है। पाकिस्तान के भी दोस्त रहे और बहोत अच्छे दोस्त रहे है कई मौको पर पाक कि तरफदारी कर चुके है साल 2008 में उन्हें पाक ने अपने दूसरे सबसे बडे नागरिक सम्मान हिलाले पाकिस्तान से नवाजा था। यहा तक कि उन्होंने पा को चार साल तक 7.5 बीलियन डालर कि सैन्य सहायता दिलाने वाला बिल साइन कराने में भी कोई कसर नहीं छोड़े थी। अब ऐसे में बाइडन का कश्मीर को लेकर उनका पक्ष पाक को मजबूती दे सकता है। उनके अलावा कमला हैरिस ने भी कशमीर को लेके हस्तक्षेप की बात कहीं थी।यहा यह भी देखना जरूरी है कि अमेरिका की एशियाई नीति में सबसे बड़ा पहलू चीन को काउंटर करना होगा क्योंकि अमेरिका प्रथम नीति के तहत राष्ट्रपति कोई भी हो चीन की बढ़ती ताकत बर्दास्त नहीं करेगा।

चीन के साथ हुए सीमा विवाद में जो बाइडन एक ऐसे माहौल को बनाने की वकालत कर चुके है जहां कोई किसी पड़ोसी के लिए दिक्कत खड़ी न करे और चीन-भारत मुद्दे पर वो भारत के पक्ष में खड़े दिखे यानी भारत से करीबी संबंधों को दोनों ही दल महत्व देते है। आपको बता दे कि दोनों देशाों के रिशते रिपब्लिकन राश्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में मजबूत हुए थे। वही डेमोके्रटिक राष्ट्रपतियों जैसे बिल क्लिंटन और बराक ओबामा के कार्यकाल में भी दोनों देषों के बीच घनिष्टता बढ़ी थी। पाक मुद्दे पर जैसी नीति बराक ओबामा की रही वैसे ही बाइडन की उम्मीद है लेकिन ये भी नहीं भूलना चाहिए कि बराक ओबामा ने भले ही आर्थिक वैरियर पाक पर न लगाये हो लेकिन आतंकवाद मुद्दे पर वो सख्त थे। और ओसामा बिल लादेन का खात्मा उन्हीं के कार्यकाल में हुआ था। और जो बाइडन उसी डेमोके्रट विचारधारा से आते है। इसी तरह देखा जाये तो डेमोके्रटस कि इच्छा रही है भारत का विकास आर्थिक विकास तेजी से हो और इसके पीछे उनका हित है क्योंकि चीन का मुकाबला करने में हम अमेरिका से साझेदार बन सके इसलिये उनका ऐसा सोचना है लेकिन इसके लिये व्यापार या आर्थिक मोर्चे पर पिछले कुछ सालों में या पिछले कुछ दशकों में किसी बडे़ और खास लेन-देन पर जोर दिया गया हो ऐसा बमुश्किल दिखाई पड़ता है।

वैसे डेमोके्रटिक पार्टी कि बात हुई है तो यहा एक तथ्य यह भी है कि डेमोके्रटिक राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डिलेनो रुजबेल्ट जो 1933-1945 के बीच राष्ट्रपति थे अमेरिका के वो भारत की स्वतंत्रता के हितकारी थे लेकिन वो उस समय के ब्रिटेन के पीएम विंस्टन चर्चिल को इसकी आवश्यकता के बारे में यानी तात्कालीक आवश्यकता के बारे में सहमत नहीं कर पाये थे लेकिन उनके भीतर कही न कही भारत को लेेके साफट कार्नर था और उपनिवेषवाद ताकतों को वो सही नहीं मानते थे।खैर भारत-अमेरिका संबंध का बेहतर होना दोनों देशों कि लिये अहम है और समय के साथ यह साझेदार बहुआयामी हो चुकी है जिसमें सैन्य सहयोग, आर्थिक सहयोग, प्रोद्योगिकी, अंतरिक्ष और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र शामिल  है ऐसे में जो बाइडन भारत के लिये कुछ क्षेत्रों में कुछ मसलों पर हितकारी होंगे तो कुछ मुद्दों पर उनकी राय परेशान कर सकती है हालाकि राजनीति में समीकरण और सोच कब पलट जाये पता नहीं रहता।

अभिषेक नामदेव (लेखक)

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जेल एक सुधारात्मक सुविधा है जो कानून तोड़ने वाले व्यक्तियों के रहने के लिए है। जेलों का उद्देश्य कैदियों का सुधार है। इसके बावजूद, जेल प्रणाली अक्सर अपने बंद दरवाजों के पीछे हिंसा और अवसाद को छिपाती है, जो अपराधियों के सुधार के लिए हानिकारक है। इस प्रकार कैदियों के बुनियादी अधिकारों को उनके सुधार को प्रोत्साहित करने के लिए पहचानना और पूरा करना आवश्यक है। महिला कैदियों के संदर्भ में कारावास से संबंधित समस्याएं और भी अधिक स्पष्ट हो जाती हैं। जेल सिस्टम मुख्य रूप से पुरुषों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है और जेल में महिलाओं की विशेष आवश्यकताओं को संबोधित करने के लिए अच्छी तरह से सुसज्जित नहीं हैं। 2015 के अंत से उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारतीय जेल 17,834 महिलाओं के घर थे। इनमें से केवल 17% महिलाएं विशेष रूप से महिला जेलों में रहती हैं, जबकि बहुसंख्यक सामान्य जेलों के महिला बाड़ों में रखे जाते हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समझौता है कि जेलों और उनमें रहने वाली महिलाओं की स्थिति में तत्काल सुधार की आवश्यकता है। अंतर्राष्ट्रीय समझौता है कि कैदियों, विशेषकर महिला कैदियों की स्थिति निराशाजनक और तत्काल सुधार की आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2011 में बैंकॉक नियमों को अपनाया, जिसमें जेल में महिलाओं के इलाज के लिए नियम बनाए गए और महिला अपराधियों के लिए कुछ गैर-हिरासत उपायों को निर्धारित किया गया। 2015 में, नेल्सन मंडेला नियम संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया था, जिसने महिलाओं के साथ कैदियों के इलाज के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यूनतम मानक निर्धारित किया था।

 

कानूनों, नियमों और दिशानिर्देशों के रूप में कई प्रावधान हैं जो महिलाओं को जेल में शोषण से बचाते हैं और उन्हें बुनियादी सेवाओं की गारंटी देते हैं। हालाँकि, इन प्रावधानों के कार्यान्वयन में काफी कमी पाई जाती है और महिलाओं को जेल में रहने के दौरान कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। महिला कर्मचारियों की भारी कमी है, जिसमें गार्ड, अधिकारी, डॉक्टर, नर्स, काउंसलर आदि शामिल हैं। आवास की व्यवस्था अक्सर अपर्याप्त होती है, जो अधिकांश जेलों में अत्यधिक भीड़भाड़ से होती है। स्वच्छता और स्वच्छता के लिए शौचालय, स्नानघर और अन्य बुनियादी प्राथमिकताओं की अपर्याप्त संख्या हैं। पानी और मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों का अपर्याप्त प्रावधान एक गंभीर चिंता का विषय है। जेल में महिलाओं की शारीरिक, यौन, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए महिला चिकित्सा कर्मियों और सुविधाओं की कमी है। पोषण, जो स्वास्थ्य से निकटता से जुड़ा हुआ है, विशेष रूप से गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं और बच्चों के लिए जेल में चिंता का विषय है। जबकि उन्हें एक विशेष आहार दिया जाना है, इसका हमेशा पालन नहीं किया जाता है। महिलाएं जेल में रहते हुए शिक्षा हासिल करने की हकदार हैं, लेकिन बुनियादी साक्षरता के प्रावधानों के अलावा, शैक्षणिक सुविधाएं काफी हद तक गायब हैं। कौशल और व्यावसायिक प्रशिक्षण को भी सुधार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, और हर जेल इन सेवाओं को प्रदान करने के लिए है। इस संबंध में प्रयास काफी हद तक प्रत्यक्ष रूप से बरक़रार हैं, जिसमें अधिकांश पाठ्यक्रम ऐसे कौशल प्रदान करने वाले हैं जो अप्राप्य, आर्थिक रूप से अविभाज्य हैं और इस तरह से रिलीज़ होने के बाद महिलाओं के लिए इसका अधिक उपयोग नहीं होता है। सभी कैदियों को कानूनी सहायता का अधिकार है, जिसके लिए शिकायतों, अंडर-ट्रायल, अपीलों आदि के मामलों में मदद करने के लिए हर जेल में कानूनी सहायता सेल होनी चाहिए। ये सभी जेलों में नहीं पाए जाते हैं, और राज्य और जिला कानूनी सेवा प्राधिकरणों के साथ जुड़ाव में सुधार किया जा सकता है। जेलों में शारीरिक और यौन हिंसा एक सामान्य परिदृश्य है, जिसका सामना अधिकारियों और अन्य कैदियों के हाथों कैदियों द्वारा किया जाता है। जेल में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनकी शिकायतों को दूर करने के प्रावधानों का कड़ाई से पालन किए जाने की आवश्यकता है, जो वर्तमान में ऐसा नहीं है। जेल एक अछूता दुनिया है, और यह महत्वपूर्ण है कि विशेष रूप से महिलाएं जेल से बाहर अपने सामाजिक नेटवर्क के साथ संपर्क बनाए रखें ताकि रिहाई के बाद एक रोकपूर्ण संक्रमण सुनिश्चित हो सके। जबकि महिलाओं के मामले में पत्र, फोन कॉल और मुलाकातों की सीमा में ढील दी गई है, लेकिन संपर्क को बनाए रखने और महिला कैदियों से जुड़े सामाजिक कलंक को दूर करने में उनकी मदद करने की अधिक आवश्यकता है। कई महिलाएं अपने बच्चों के साथ जेल में रहती हैं (6 वर्ष से कम उम्र के) उन मामलों में जहां उनकी देखभाल के लिए कोई अन्य पर्याप्त व्यवस्था नहीं की जा सकती है। जेल में अपने प्रारंभिक वर्षों को बिताने से बच्चों पर बहुत अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और इस प्रकार उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और मनोरंजन को सुनिश्चित करने के लिए विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। गर्भवती महिलाओं और माताओं के स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना आवश्यक है। समाज में पुन: एकीकरण कई महिला कैदियों के लिए एक चुनौती है, क्योंकि वे गंभीर सामाजिक कलंक, पारिवारिक संबंधों और रोजगार की हानि, आर्थिक स्वतंत्रता की कमी और रिहाई के बाद इतने पर सामना करते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जाने की आवश्यकता है कि महिलाओं को जेल में रहने के दौरान सभी बुनियादी सेवाएं प्राप्त हों, हिंसा से बचाया जाए और समाज में प्रभावी रूप से जगह बनाने के लिए रिहाई के बाद समर्थन किया जाए।

 

जेलों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग, जैसा कि मुल्ला समिति द्वारा भी सिफारिश की गई है, जेलों पर एक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करने के लिए स्थापित किया जाना चाहिए और इन के लिए जिम्मेदार एक केंद्रीय निकाय होना चाहिए। जेलों का नियमित और गहन निरीक्षण भी यह सुनिश्चित करने का एक प्रभावी तरीका है कि नियमों का पालन किया जा रहा है। सभी जेलों में इसका प्रयोग किया जाना चाहिए, एक स्वतंत्र भावना के साथ निरीक्षण किया गया और कई सरकारी एजेंसियों के साथ साझा की गई रिपोर्ट। सभी जेलों में एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र रखा जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कैदियों के अधिकारों का उल्लंघन न हो और उनकी चिंताओं को निष्पक्ष रूप से सुना जाए। उनकी शिकायतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए कैदियों के लिए आंतरिक और बाहरी दोनों तरह के तंत्र होने चाहिए। महिलाओं की गिरफ्तारी के समय विशेष प्रक्रियाओं को परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि उनके बच्चों के साथ-साथ उनकी सबसे अच्छी रुचि सुनिश्चित हो सके। चूंकि प्रवेश के समय और पूरे जेल जीवन में खोज एक अनुभव हो सकती है जहां महिला कैदियों को अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ता है, इन्हें परिभाषित एसओपी द्वारा सख्ती से विनियमित किया जाना चाहिए। जेल में गर्भावस्था और प्रसव के लिए पर्याप्त प्रावधान किए जाने चाहिए, जिसमें चिकित्सा, आहार और आवास संबंधी सुधार शामिल हैं। कैदियों के बच्चे, उनके साथ रहने वाले और बाहर रहने वाले दोनों, कभी भी खुद को कैदी नहीं माना जाना चाहिए। शारीरिक और मानसिक दोनों स्वास्थ्य आवश्यकताओं को उचित और नियमित रूप से संबोधित किया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर महिला कैदियों की डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों तक पहुंच होनी चाहिए। कैदियों की क्षमताओं के अनुसार शैक्षिक सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। जेल में व्यावसायिक प्रशिक्षण और कौशल सुविधाओं को भी उन्नत किया जाना चाहिए क्योंकि यह कैदियों के दैनिक जीवन में सुधार कर सकता है और रिहाई के बाद उन्हें आर्थिक सहायता दे सकता है। बिस्तर, पर्याप्त रोशनी, पर्याप्त संख्या में शौचालय, संस्कृति के अनुसार कपड़ों के विकल्प आदि के संदर्भ में महिला कैदियों की रहने की स्थिति में सुधार किया जाना चाहिए। जिला और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के साथ कानूनी सहायता के प्रावधान लागू किए जाने चाहिए। सभी अधिकारों और अधिकारों को महिलाओं को एक ऐसी भाषा में समझाया जाना चाहिए जिसे वे समझ सकें। भारत में अंडर ट्रायल कैदियों की संख्या बहुत बड़ी है। सीआरपीसी की धारा 436 ए के तहत उनकी जल्द रिहाई की सुविधा के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। साथ ही उन मामलों में जहां रिहाई पर ज़मानत देने में असमर्थ हैं। इसके अलावा, गैर-कस्टोडियल उपायों जैसे कि सामुदायिक सेवा, आश्रयों में आवास आदि को महिला अपराधियों के मामले में वरीयता दी जानी चाहिए। एक व्यापक देखभाल कार्यक्रम के बाद पुनर्वसन को रोका जा सकता है और रिहाई के बाद समाज में महिलाओं के निर्बाध संक्रमण में मदद मिल सकती है। इसमें पश्चात कारावास जीवन के विभिन्न पहलुओं के लिए समर्थन शामिल होना चाहिए, जिसमें आवास, रोजगार, विवाह, बच्चों की हिरासत स्थानीय पुलिस द्वारा उत्पीड़न की रोकथाम आदि शामिल हैं।

 

भारत में जेल में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई मुद्दों पर जेल में महिलाओं के जीवन को नुकसान पहुंचता है, जिनमें से कई परीक्षण के अधीन हैं। जेल प्रभावी रूप से अपने सुधारवादी उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर रहे हैं। इस प्रकार जेल में महिलाओं के मुद्दों को समझने और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए इन अधिकारों को पूरा करने की तत्काल आवश्यकता है। हालांकि कैदियों के कल्याण और निष्पक्ष उपचार के लिए कई प्रगतिशील नियम निर्धारित किए गए हैं, विशेषकर महिलाओं के लिए, यह हमेशा व्यवहार में अनुवाद नहीं होता है। महिलाओं को महिला कर्मचारियों की कमी, अपर्याप्त और तंग आवास, स्वच्छता और स्वच्छता के निम्न स्तर, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं, कमी पोषण, नगण्य शैक्षिक अवसरों और अक्सर अनुपयोगी कौशल और व्यावसायिक प्रशिक्षण को संबोधित करने के लिए अपर्याप्त सेवाओं से संबंधित मुद्दों का सामना करना पड़ता है। कई महिलाएं जो अपने बच्चों के साथ रहती हैं, उन्हें अच्छी तरह से उठाने के लिए उपयुक्त शैक्षिक, स्वास्थ्य और मनोरंजक सेवाएं नहीं मिलती हैं। ये मुद्दे जेल में कानूनी सहायता की कमी, बाहरी दुनिया के साथ सीमित संपर्क और कैदियों और अधिकारियों द्वारा हिंसा की उच्च घटनाओं के साथ मिलकर महिलाओं के लिए स्थिति को और बढ़ा देते हैं। रिहाई के बाद समाज में उनका पुन: एकीकरण भी एक बड़ी चुनौती है। जैसे-जैसे अधिक महिलाएं जेल प्रणाली में प्रवेश करती हैं, उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सेवाओं, प्रक्रियाओं और बुनियादी ढांचे में उचित बदलाव करना आवश्यक है। जेलें बाहरी दुनिया के लिए बंद रहती हैं, इस प्रकार यह अच्छी स्थिति सुनिश्चित करने के लिए और अधिक कठिन बना देती है। स्वतंत्र और नियमित निरीक्षण की अनुमति देना महत्वपूर्ण है ताकि नियमों का पालन बेहतर हो। जेल प्रशासन और महिला कैदियों के साथ काम करने वाले सभी कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से लिंग संवेदनशील प्रशिक्षण से गुजरना चाहिए, जो उन्हें जेल में महिलाओं के संबंध में बेहतर निर्णय लेने में मदद करेगा। उन्हें अल्पसंख्यक समुदायों, विकलांग महिलाओं और विदेशी नागरिकों से जुड़ी महिलाओं की जरूरतों के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए ताकि किसी भी तरह से उनके साथ भेदभाव न हो। जेल में अधिकारों के उल्लंघन को दूर करने और कैदियों को प्रशासन के साथ बातचीत करने के लिए एक विधि देने में मदद करने के लिए एक वास्तविक और उत्तरदायी शिकायत निवारण तंत्र रखा जाना चाहिए। जेल के भीतर स्थितियों में सुधार करके, रिहाई पर बेहतर समर्थन प्रदान करना और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं को जहां तक संभव हो औपचारिक जेल प्रणालियों से बाहर रखा जाए, तो भारत में महिला अपराध के मुद्दे से बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है।

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रायपुर, 29 अक्टूबर 2020/मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में छत्तीसगढ़ी खानपान एवं व्यंजन विक्रय केन्द्र गढ़कलेवा शुरू करने के निर्देश दिए हैं। रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में प्रयोग के तौर पर छत्तीसगढ़ी खानपान एवं व्यंजन विक्रय केन्द्र संचालित है। यह रायपुर शहर के अन्य खान-पान केन्द्रों से प्रतिस्पर्धा करते हुए, गुणवत्ता और मानकों पर खरा उतरा है, जिससे पारंपरिक और स्वास्थ्यकर, स्वादिष्ट खान-पान को बल मिला है। मुख्यमंत्री के निर्देशों के अनुरूप संस्कृति विभाग द्वारा राज्य के सभी जिला मुख्यालयों में गढ़कलेवा शुरू किया गया है।
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छत्तीसगढ़ की संस्कृति में खान-पान की विशिष्ट परंपराए हैं, जो हर प्रहर, बेला, मौसम और तीज त्यौहारों के अवसर पर पकाए, खाए और खिलाए जाते हैं। वनवासी-जनजातीय समाज का कलेवा मुख्यतः प्राकृतिक वनोपज पर आधारित है, तो जनपदीय संस्कृति के वाहकों के कलेवा में रोचक रसपूर्ण विविधता है। मांगलिक और गैरमांगलिक दोनों प्रसंग के व्यंजनों की अपार श्रृंखला है। ये व्यंजन भुने हुए, भाप से पकाये, तेल में तले और ये तीनों के बगैर भी तैयार होते हैं।

छत्तीसगढ़ के कुछ प्रमुख पकवानों में चीला, बेसन चीला, गुरहा चीला, फरा, मुठिया, धुसका, चंाउर रोटी, चंउर पातर रोटी, खुपुर्री रोटी, बफौरी, चंवसेला, बरा, पताल चटनी, देहरउरी, अईरसा, दुधफरा, पकवा, ठेठरी, खुरमी, बिडि़या, पिडि़या, पपची, पूरन लाडू, करी लाडू, बुंदी लाडू, मुर्रा लाडू, लाई लाडू शामिल है।4760 1 3
राज्य शासन द्वारा छत्तीसगढ़ी खान-पान एवं व्यंजन विक्रय केन्द्र गढ़कलेवा छत्तीसगढ़ के सभी जिला मुख्यालयों में वित्तीय वर्ष 2020-21 में प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया है। इसके अतर्गत स्थानीय महिला स्वसहायता समूहों को प्रशिक्षित कर तथा गढ़कलेवा हेतु स्थल, शेड़ आदि तैयार कर संचालन हेतु दिया जाएगा। जिससे समूह के गरीब परिवारों को जीवन यापन के लिए स्वरोजगार प्राप्त हो सके और आत्म निर्भर बन सकंे। 4760 1 4भारत सरकार की योजना ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय काईट फेस्टिवल 06 से 14 जनवरी 2019 में गुजरात के अहमदाबाद में छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं छत्तीसगढ़ व्यंजन स्टाल लगाया गया था, जहां लोगों ने छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का भरपूर लुत्फ उठाया।

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मेष: राजनीतिक महात्वाकांक्षा की पूर्ति होगी। उच्च अधिकारी या उच्च राजनेता का सहयोग मिल सकता है। ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ेगी। सम्मान में वृद्धि होगी।

वृष: नए कार्य या नौकरी की दिशा में सफलता मिल सकती है। शिक्षा प्रतियोगिता के क्षेत्र में भी सफलता का योग है। रचनात्मक कार्यों में मन लगाएं, सफलता मिलेगी।

मिथुन: स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की आवश्यकता है। पारिवारिक दायित्व की पूर्ति होगी। जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा। बुद्धि कौशल से किया गया कार्य संपन्न होगा।

कर्क: व्यावसायिक मामलों में सफलता मिलेगी, लेकिन कोई ऐसी बात भी हो सकती है, जो आपके हित में न हो। आर्थिक मामलों में जोखिम न उठाएं।

सिंह: संतान के दायित्व की पूर्ति होगी। बुद्धि कौशल से किया गया कार्य संपन्न होगा। पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति होगी।

कन्या: धन, सम्मान, यश और कीर्ति में वृद्धि होगी। शिक्षा प्रतियोगिता के क्षेत्र मे आशातीत सफलता मिलेगी। रिश्तों में निकटता आएगी। रचनात्मक प्रयास फलीभूत होंगे।

तुला: प्रियजन से भेंट, उच्च अधिकारी का सहयोग तथा किया गया पुरुषार्थ सार्थक होगा। नेत्र या उदर विकार के प्रति सचेत रहें। जीविका के क्षेत्र में प्रगति होगी।

वृश्चिक: महिला अधिकारी का सहयोग मिलेगा। क्रोध पर नियंत्रण रखें। छोटी-छोटी बातों पर उत्तेजित न हों। पारिवारिक दायित्व की पूर्ति होगी। मधुर संबंध बनेंगे।

धनु: व्यावसायिक प्रयास फलीभूत होगा। जीविका के क्षेत्र में प्रगति होगी। शासन सत्ता का सहयोग रहेगा। रचनात्मक कार्यों में प्रगति होगी। पारिवारिक संबंध मधुर होंगे।

मकर: पारिवारिक दायित्व की पूर्ति होगी। पिता या धर्म गुरु से सहयोग मिल सकता है। आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। बुद्धि कौशल से किया गया कार्य संपन्न होगा।

कुंभ: रचनात्मक कार्यों में सफलता मिलेगी। जीवनसाथी का सहयोग रहेगा। संतान के संबंध में सुखद समाचार मिलेगा। धन, सम्मान, यश और कीर्ति में वृद्धि होगी।

मीन: व्यावसायिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। चल या अचल संपत्ति में वृद्धि होगी। रिश्तों में निकटता आएगी। पारिवारिक स्तर पर सहयोग मिलेगा। रचनात्मक प्रयास फलीभूत होंगे।

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मेष- व्यस्तता रहेगी, नौकरी में परिवर्तन होगा, धन आसानी से मिलेगा.

वृषभ- नौकरी में बड़ा अवसर मिलेगा, संतान प्राप्ति की समस्या हल होगी, पुराना धन मिल सकता है.

मिथुन- सेहत बिगड़ सकती है, करियर का ध्यान रखें, यात्रा से नुकसान होगा.

कर्क- आलस्य से भरा दिन होगा, परिवार में तनाव हो सकता है, कोई शुभ सूचना मिलेगी

सिंह- करियर में लाभ के योग हैं, संपत्ति की समस्या हल होगी, दौड़-भाग बढ़ी रहेगी.

कन्या- करियर में लाभ के योग हैं, संपत्ति की समस्या हल होगी, दौड़-भाग बढ़ी रहेगी

तुला- तमाम दायित्वों को निभाना पड़ेगा, रुके कार्य पूरे होंगे, रिश्ते आज समस्या देंगे.

वृश्चिक- परिवार में मंगल कार्य होगा, नौकरी में सुधार होगा, धन लाभ के योग हैं.

धनु- परिवर्तन के योग हैं, नौकरी में तरक्की होगी, रिश्तों की समस्या हल होगी.

मकर- दौड़-भाग करनी पड़ेगी, नौकरी में समस्या हो सकती है, धन हानि से बचाव करें

कुंभ- पुरानी इच्छा पूरी होगी, मुकदमों का निपटारा हो सकता है, प्रेम संबंधों की शुरुआत हो सकती है.

मीन- महत्वपूर्ण अवसर छूट सकता है, तनाव और दबाव बना रहेगा, मित्र के सहयोग से लाभ होगा.

 

 

 

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The Edition Today Magazine (July - 2020)