राजनीति

राजनीति (8)

नई दिल्‍ली। आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने रविवार को तीसरी बार मुख्‍यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ सात अन्‍य मंत्रियों ने भी शपथ ली। ये मंत्री पिछली बार भी केजरीवाल की केबिनेट का हिस्‍सा थे। शपथ के बाद उन्‍होंने दिल्‍लीवासियों को संबोधित भी किया। इस भाषण के अंत में उन्‍होंने पिछली बार की तरह एक गीत भी सुनाया। ये गीत था हम होंगे कामयाब एक दिन। पिछली बार उन्‍होंने मंच से इंसान का इंसान से हो भाईचारा सुनाया था। जानें उनके भाषण के प्रमुख अंश:- दिल्‍ली वालों को मेरा नमस्‍कार और प्रणामआपके बेटे ने तीसरी बार सीएम पद की शपथ ली। ये एक-एक दिल्‍ली वाले की जीत है मां, बहन और युवा और विद्यार्थी की जीत है। बीते पांच वर्षों में सरकार की यही कोशिश रही है कि हर एक दिल्‍ली वालों के जीवन में खुशहाली ला सकें। इस बार भी आने वाले पांच वर्ष दिल्‍ली तेजी से विकास करने में लगेंगे। सभी अपने गांव में फोन कर देना की हमारा बेटा फिर सीएम बन गया है अब चिंता की कोई बात नहीं है।आज शपथ के बाद मैं आप कांग्रेस और भाजपा को वोट देने वालों का भी मुख्‍यमंत्री हूं। बीत पांच वर्षों में किसी के साथ सौतेला व्‍यवहार नहीं किया है। हर किसी का काम किया है। आने वाले पांच वर्षों में भी यह ऐसे ही जारी रहेगा। दिल्‍ली के दो करोड़ लोग मेरे परिवार का हिस्‍सा हैं। कोई काम हो तो मेरे पास आना सभी का काम होगा। बिना ये जाने की कौन किस धर्म का है जाति का हो। मै अकेला दिल्‍ली में हर बड़ा काम नहीं कर सकता हूं इसमें आपका साथ चाहिए। चुनाव अब खत्‍म हो गया है इस दौरान कई तरह की भाषणाबजी हुई। जिन्‍होंने हमारे ऊपर आरोप लगाए उन्‍हें हमनें माफ कर दिया है। विरोधियों से अपील है कि वह भी सब बातों को भूल कर दिल्‍ली के विकास में भागीदार बनें।

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जलगांव,(महाराष्ट्र)। इस साल अप्रैल में राज्य(महाराष्ट्र) में 'Operation Lotus' की अटकलों के बीच विपक्ष पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने शनिवार को बीजेपी को खुली चुनौती दी है। सीएम उद्धव ठाकरे ने बीजेपी से कहा है कि अगर उनमें हिम्मत है तो महाराष्ट्र विकास आघाडी (एमवीए) सरकार को गिराकर दिखाएं। महा विकास अघाड़ी शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस का गठबंधन है, जिसने पिछले साल नवंबर में महाराष्ट्र में सरकार बनाई थी। ठाकरे ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार की मौजूदगी में जलगांव के मुक्तेई नगर में एक किसान रैली में कहा, ' अगर उनमें हिम्मत है तो वे महा विकास अघाड़ी को गिराकर दिखाएं। उन्होंनें कहा कि जब से हमने पदभार संभाला है, भाजपा लगातार हमारी आलोचना कर रही है। भाजपा नेता दावा करते रहे हैं कि हमारा गठबंधन लंबे समय तक नहीं रहेगा और वे सत्ता में लौट आएंगे।लेकिन सच तो ये है कि हम एक मजबूत सरकार के साथ एकजुट हैं।' उन्होंने कहा कि अगर आप (भाजपा) हमारी सरकार को गिराने के बारे में सोच रहे हैं, तो मैं आज आपको सरकार गिराने की खुली चुनौती देता हूं। मैं बाला साहेब ठाकरे का बेटे चुनौती देना चाहता हूं। सीएम उद्धव ठाकरे का बयान महा विकास अघाड़ी के भीतर नाराजगी में बीजेपी के साथ चल रही प्रतिक्रिया के बीच आईू है, जो एल्गर परिषद की जांच को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपने के मुख्यमंत्री के फैसले का विरोध नहीं करती है।

यहां तक ​​कि पवार और कांग्रेस के महाराष्ट्र प्रभारी मल्लिकार्जुन खड़गे ने मामले में एनआईए द्वारा जांच की अनुमति देने के फैसले पर ठाकरे की आलोचना की। इस मौके को हथियाने के लिए भाजपा ने सत्तारूढ़ गठबंधन पर निशाना साधा है और कहा है कि राज्य में मध्यावधि चुनाव होंगे। ठाकरे ने भाजपा के वरिष्ठ नेता एकनाथ खडसे का नाम लिए बिना उन्होंने उस बयान का खंडन किया जिसमें कहा गया कि महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन टूटने के लिए तैयार है। ठाकरे ने कहा, 'खड़से का गृहनगर मुक्तानगर आज मुक्त हो गया है।'

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अलवर. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अलवर के विजय नगर मैदान से राज्य में चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की। मोदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का कोई जज जब अयोध्या जैसे गंभीर मुद्दे पर न्याय दिलाने की दिशा में आगे बढ़ता है तो कांग्रेस जजों के खिलाफ महाभियोग लाकर उन्हें डराती-धमकाती है।
मोदी ने कहा कि जब अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। कांग्रेस के नेता और राज्यसभा के सदस्य ने कहा कि 2019 तक केस मत चलाओ क्योंकि 2019 में चुनाव हैं। देश के न्यायतंत्र को इस प्रकार राजनीति में घसीटना उचित है क्या? यह भी कहा कि कांग्रेस के पास चुनाव में मुद्दा नहीं है। उनके नेता कभी मेरी मां को गाली देते हैं, कभी मेरी जाति को लेकर सवाल पूछते हैं। पूरा देश यह जान गया है कि ये सब नामदार (राहुल गांधी) के कहने पर हो रहा है।
'नफरत का भाव कांग्रेस की रगों में'
मोदी ने यह भी कहा, "कांग्रेस जातिवाद का जहर फैलाने से बाज नहीं आ रही। दलितों और पिछड़ों के प्रति नफरत का भाव कांग्रेस की रगों में भरा पड़ा है। अलवर की धरती गौरव और अहंकार को चूर करने वाली है। यहां के लोग नामदारों के अहंकार को चकनाचूर कर देंगे। कांग्रेस में हिम्मत हो तो वसुंधरा जी ने जो काम किया है, उसे चुनौती दें। लेकिन उनकी सरकार के कार्यकाल का हिसाब इतना बुरा है कि उसे याद करने की भी हिम्मत नहीं है।
'जो लोग बम दागते थे, हमने उन्हें कटोरा थमा दिया'
"कांग्रेस की जातिवादी मानसिकता का ही परिणाम है कि जहां-जहां कांग्रेस को सरकार चलाने का मौका मिला वहां दलितों के नरसंहार हुए। कांग्रेस ने देश को तोड़ने का काम किया।"
"जो लोग कल तक भारत पर बम दागने की धमकी देते थे, आज हमारी रणनीति ने उनके हाथ में कटोरा थमा दिया।"
"कांग्रेस पार्टी इतनी नीचे गिरती जा रही है कि उन्होंने राजनीति के संस्कार छोड़ दिए। वे शिष्टाचार भूल गए हैं।"
"बाबा साहब को भारत रत्न मिलना चाहिए था। लेकिन इन्होंने एक ही परिवार के चार रत्नों को भारत रत्न दे दिए। बाबा साहब की याद तक नही आई।"
"कांग्रेस के लोग सुप्रीम कोर्ट में जाकर बोल रहें है कि राम मंदिर केस की सुनवाई 2019 से पहले नहीं होनी चाहिए। क्योंकि देश में कई चुनाव हैं।"
"राजस्थान में कांग्रेस के नेता भारत माता की जय बोलने की बजाय सोनिया गांधी की जय बोलने के लिए कह रहे हैं। कांग्रेस के लिए भारत माता से बड़ी भी कोई और माता है।"
"कबीर के गुरु रामानंद ने कहा था- जो हरि को भजे, वो हरि का कोई। हमने भी यही संस्कार पाए है। गरीब, वंचित, अनपढ़, पढ़ा लिखा यानी हर व्यक्ति हरि का रूप है। इसलिए मैं यही कहूंगा कि जो गरीब को भजे, वो गरीब का होई। जो जनता, युवा, भारत को भजे, वो इनका होई।''
राहुल ने जोशी के बयान पर किया था ट़्वीट
बुधवार को डॉ. सीपी जोशी ने नाथद्वारा के सेमा गांव में चुनावी सभा की थी। इस दौरान उन्होंने कहा था, "ऋतंभरा और मोदी की जाति क्या है, ये हिंदू धर्म के बारे में कैसे बात करते हैं? इस देश में अगर धर्म के बारे में कोई जानता है तो पंडित जानता है। अजीब देश हो गया है। उमा भारती लोधी समाज की हैं और वो हिंदू धर्म की बात कर रही हैं।" हालांकि, बाद में जोशी की इस जातिगत टिप्पणी पर राहुल गांधी ने ऐतराज जताया। राहुल ने ट्वीट किया, "सीपी जोशी जी का बयान कांग्रेस के आदर्शों के विपरीत है।"
5 साल पहले मुख्यमंत्री के रूप में अलवर आए थे मोदी
गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी 2013 के विधानसभा चुनाव में 5 साल पहले 19 नवंबर को अलवर आए थे। उस समय मोदी प्रधानमंत्री पद के भाजपा के घोषित प्रत्याशी थे। उन्होंने इसी विजय नगर मैदान पर जनसभा में कहा था कि अब वह प्रधानमंत्री बनने के बाद अलवर आएंगे।

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अयोध्या. रविवार को यहां होने वाली धर्म सभा से पहले विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि यह हमारी अाखिरी बैठक होगी। इसके बाद और सभाएं या प्रदर्शन नहीं होंगे। न ही किसी को समझाया जाएगा। सीधे मंदिर निर्माण होगा। विहिप के संगठन सचिव भोलेंद्र ने कहा, ‘‘हमने पहले 1950 से 1985 तक 35 साल अदालती फैसले का इंतजार किया। इसके बाद 1985 से 2010 तक का समय हाईकोर्ट को फैसला देने में लग गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई की अर्जी दो मिनट में ठुकरा दी। दुर्भाग्य है कि 33 साल से रामलला टेंट में हैं। अब और इंतजार नहीं होगा।’’ इस बीच, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे शनिवार सुबह मुंबई से अयोध्या के लिए रवाना हो गए। उनकी पार्टी के कार्यकर्ता भी 2 स्पेशल ट्रेनों से अयोध्या पहुंच रहे हैं। उद्धव शनिवार को लक्ष्मण किले में संतों से मुलाकात करेंगे। शाम को सरयू आरती में शामिल होंगे। रविवार सुबह रामलला के दर्शन का कार्यक्रम है।
राम मंदिर के लिए धर्म सभा को पहली बार संघ का खुला समर्थन
रविवार को अयोध्या में धर्म सभा बुलाई गई है। विश्व हिंदू परिषद और कई हिंदू संगठन इसका हिस्सा हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पहली बार इसे ना केवल खुला समर्थन दिया है, बल्कि प्रबंधन का जिम्मा भी संभाला है। राम मंदिर को लेकर 1992 के बाद एक बार फिर अयोध्या में हिंदू संगठनों का जमावड़ा हुआ है। सियासत गर्म है, लेकिन अयोध्या शांत नजर आती है। राम मंदिर विवाद से जुड़े लोग कहते हैं- हमें डर नहीं है। 1992 जैसा कुछ दिखाई नहीं देता।
24-25 नवंबर के लिए क्या हैं हिंदू संगठनों की तैयारियां?
शिवसेना: उद्धव 2 बजे लक्ष्मण किला में संत आशीर्वाद सम्मेलन में शामिल होंगे। यहां राम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास, भाजपा सांसद लल्लू सिंह, भाजपा विधायक वेद प्रकाश गुप्ता को भी बुलाया गया है। 2 विशेष ट्रेनें शिवसैनिकों को लेकर पहुंचेंगी। इनमें करीब 4 हजार शिवसैनिकों के आने की उम्मीद है। उद्धव की रैली को प्रशासन ने अनुमति नहीं दी है।
रविवार को धर्म सभा की तैयारियां पूरी हो गई हैं। भक्तमाल बगिया में होने कार्यक्रम का प्रबंधन इस बार संघ देख रहा है, विहिप सहयोग कर रही है। 100 बीघे के इस आयोजन स्थल पर देशभर से करीब 2 लाख लोगों के आने का अनुमान है। इनमें साधु, संत, विहिप-भाजपा-संघ के कार्यकर्ता होंगे। हालांकि, सभा के मंच पर साधु-संत बैठेंगे, कोई राजनेता नहीं।
प्रशासन ने क्या इंतजाम किए?
अयोध्या और आस-पास के जिलों की पुलिस बुलाई गई है। 70 हजार जवानों की तैनाती की गई है।
पीएसी की 48 कंपनियां, आरएएफ की 5 कंपनियां भी अयोध्या में रहेंगी। एटीएस कमांडो भी तैनात किए गए हैं।
पूरी अयोध्या पर ड्रोन कैमरों से नजर रखी जाएगी। खुफिया विभाग के अफसर और उनकी टीमें पहले से ही एक्शन में आ चुकी हैं।
शिवसेना, विहिप, संघ और हिंदू संगठनों का जमावड़ा क्यों?
वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल और संजय भटनागर कहते हैं- शिवसेना के लिए राम मंदिर मुद्दा टेस्ट है। वह महाराष्ट्र से बाहर भी निकलना चाहती है। मंदिर मुद्दे पर शिवसेना ने बढ़त हासिल कर ली तो 2019 के चुनावों में भाजपा के सामने शर्तें रखने की स्थिति में होगी। बाल ठाकरे के निधन के बाद अब तक भाजपा ने शिवसेना के मुद्दे उठाए भी और बढ़त भी हासिल की।
दोनों ने कहा- जहां तक बात धर्म सभा की है, तो ये भाजपा के लिए परीक्षा की तरह है। भाजपा यह देखना चाह रही है कि मंदिर मुद्दे में कितना दम है। 2019 चुनाव में ये कितना असर डालेगा और 5 राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के नतीजे भी यह बता देंगे कि मंदिर मुद्दा और धर्म सभा का क्या असर रहा।
शिवसेना ने कहा- विहिप से टकराव नहीं
शिवसेना सांसद संजय राउत ने उद्धव के दौरे से एक दिन पहले कहा- शिवसैनिक अयोध्या आ रहे हैं, लेकिन भक्तों के तौर पर। उद्धव भी आ रहे हैं। हमारा विहिप और संघ से कोई टकराव नहीं है। बस, हमें धर्म सभा की जानकारी पहले से नहीं थी। हमारे मकसद में अंतर नहीं है, बस कार्यक्रम की तारीखें अलग हैं। विहिप के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंपत राय ने कहा- हम संजय राउत के बयान से सहमत हैं। शिवसेना से टकराव जैसी कोई चीज नहीं है।
अयोध्यावासियों का क्या कहना है?
तुलसी वाटिका के सामने भगवानों के पोस्टरों की दुकान लगाने वाले शाह आलम ने कहा- हमारी तो कमाई ही राम से है। हमें रामभक्तों से कोई डर नहीं। उन्हीं के साथी जुबेर का कहना है कि यहां के लोगों से कोई डर नहीं। बाहरी लोगों से डर लगता है, जो राम के दर्शन नहीं.. राजनीति करने आते हैं।
बाबरी मस्जिद के पक्षकार हाजी महबूब ने कहा कि 1992 में हम अयोध्या में थे। अभी उस तरह का माहौल नहीं है। डर जैसी कोई बात नहीं है। अयोध्या में मुस्लिम उतने ही सुरक्षित हैं, जितना कि हिंदू। राम जन्मभूमि-बाबरी विवाद में मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी ने अपनी सुरक्षा बढ़ाए जाने पर कहा- दूसरे मुस्लिमों को भी सुरक्षा दी जानी चाहिए। राम मंदिर पर सियासत गरमाने के बीच शुक्रवार को कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर करीब 6 लाख श्रद्धालुओं ने अयोध्या में स्नान किया। अयोध्या की मस्जिदों में नमाज भी पढ़ी गई। अयोध्या वैसी ही थी, जैसी आम दिनों में रहती है। स्नान के बाद लोगों ने हनुमानगढ़ी में दर्शन किए और फिर राम लला के दर्शनों को गए। भीड़ की वजह से जगह-जगह बैरिकेडिंग की गई है, लेकिन लोगों से पूछने पर उन्होंने कहा- डर जैसी कोई बात नहीं है।

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अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे जब सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने एक कार्यक्रम के दौरान पंजाब में खालिस्तान लहर के दोबारा उभरने के संकेत दिए थे। उनका यह बयान बेवजह नहीं था क्योंकि अगर हम पंजाब में अभी कुछ ही महीनों में घटित होने वाली घटनाओं पर नजर डालेंगे तो समझ में आने लगेगा कि पंजाब में सब कुछ ठीक नहीं है। बरसों पहले जिस आग को बुझा दिया गया था उसकी राख में फिर से शायद किसी चिंगारी को हवा देने की कोशिशें शुरू हो गईं हैं।
 
जी हाँ पंजाब की खुशहाली और भारत की अखंडता आज एक बार फिर कुछ लोगों की आँखों में खटकने लगी है। 1931 में पहली बार अंग्रेजों ने सिक्खों को अपनी हिंदुओं से अलग पहचान बनाने के लिए उकसाया था। 1940 में पहली बार वीर सिंह भट्टी ने "खालिस्तान" शब्द को गढ़ा था। इस सबके बावजूद 1947 में भी ये लोग अपने अलगाववादी इरादों में कामयाब नहीं हो पाए थे। लेकिन 80 के दशक में पंजाब अलगाववाद की आग में ऐसा झुलसा कि देश लहूलुहान हो गया। आज एक बार फिर उसी आतंक के पुनः जीवित होने की आहट सुनाई दे रही है।
 
क्योंकि हाल ही में कश्मीर के कुख्यात आतंकी जाकिर मूसा समेत जैश ए महोम्मद के 6-7 आतंकवादियों के पंजाब में दाखिल होकर छुपे होने की खुफिया जानकारी मिली थी। इसके कुछ ही दिन बाद 2016 के पठानकोठ हमले की तर्ज पर चार संदिग्ध एक बार फिर पठानकोठ के पास माधोपुर से एक इनोवा कार लूट लेते हैं। इसके अलावा पंजाब पुलिस के हाथ भीड़ भाड़ वाले स्थानों पर हमले और कुछ खास नेताओं की टारगेट किलिंग की तैयारी कर रहे खालिस्तान गदर फ़ोर्स के आतंकी शबनम दीप सिंह लगता है जो कि पाकिस्तान खुफिया अधिकारी जावेद वज़ीर खान के संपर्क में भी था।
 
इतना ही नहीं पंजाब पुलिस की काउंटर इनटेलीजेंस विंग भी आईएसआई के एक एजेंट इंद्रजीत सिंह को मोहाली से गिरफ्तार करती है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे जब पंजाब और जम्मू-कश्मीर पुलिस की संयुक्त कार्यवाही में जालंधर के एक कॉलेज के हॉस्टल से तीन "कश्मीरी छात्रों" को ए के 47 और विस्फोटक सामग्री के साथ गिरफ्तार किया जाता है। इनमें से एक यूसुफ रफ़ीक़ भट्ट, ज़ाकिर मूसा का भतीजा है। जी हाँ  वही मूसा जो कि भारतीय सुरक्षा बलों का "मोस्ट वांटेड" है और भारतीय सेना ने उस पर 12 लाख का ईनाम घोषित किया है। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस घटना के बाद पंजाब के अन्य कई कॉलेजों से कश्मीरी छात्र भूमिगत हो जाते हैं।
 
और अब अमृतसर में निरंकारी सत्संग पर आतंकवादी हमला होता है जिसमें तीन लोगों की मौत जाती है और 20 घायल। अगर आपको लगता है कि ये कड़ियाँ आपस में नहीं मिल रहीं तो कुछ और जानकारियाँ भी हैं। इसी साल 12 अगस्त को लंदन में एक खालिस्तान समर्थक रैली का आयोजन होता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि, इन घटनाओं के समानांतर सिख फ़ॉर जस्टिस नाम का एक अलगाववादी संगठन रेफरेंडम 2020 यानी खालिस्तान के समर्थन में जनमत संग्रह कराने की मांग जोर शोर से उठाने लगता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसे आईएसआई का समर्थन प्राप्त है, जो इसे 6 जून 2020 को लान्च करने की योजना बना रहा है। जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि यह तारीख कोई संयोग नहीं, ऑपरेशन ब्लू स्टार की 30वीं बरसी है। इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि कनाडा, अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों में रहने वाले सिखों को एकजुट करके पाकिस्तान अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने की कोशिशों में लगा है।
 
इसी साल के आरंभ में जब कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रुडो भारत आए थे तो पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने उन्हें कनाडा में खालिस्तान आंदोलन फैलाने वाले लोगों के नाम की सूची सौंपी थी। दरअसल घाटी में आतंकी संगठनों पर सेना के बढ़ते दबाव के कारण वे अब पंजाब में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। पंजाब के कॉलेजों से कश्मीरी युवकों का आधुनिक हथियारों के साथ पकड़ा जाना इस बात का सबूत हैं।
और अब आतंकवादी घटना को अंजाम देने के लिए निरंकारी भवन जैसे स्थान को चुनना इत्तेफाक नहीं एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। इस बहाने ये लोग सिख समुदाय और निरंकारी मिशन के बीच मतभेद का फायदा उठाकर पंजाब को एक बार फिर आतंकवाद की आग में झुलसने की कोशिश कर रहे हैं।
 
असल में घाटी से पलायन करने के लिए मजबूर आतंकी अब पंजाब में पनाह तलाश रहे हैं। घाटी में उनकी दयनीय स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो कल तक "कश्मीर की आज़ादी" की दुहाई देकर आतंक फैलाने के लिए, सैनिकों का अपहरण और हत्या करते थे आज कश्मीर के ही बच्चों का अपहरण और हत्याएं कर रहे हैं (मुखबिरी के शक में)। यह स्थिति भारतीय सेना के समक्ष उनके द्वारा अपनी हार को स्वीकार करने और उससे उपजी निराशा को व्यक्त करने जैसा है।
 
कश्मीर का युवा अब बंदूक छोड़ कर अपने हाथों में लैपटॉप लेकर इन्हें अपना जवाब दे चुका है अब बारी पंजाब के लोगों की है। सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ अपना काम कर रही हैं लेकिन जवाब पंजाब के लोगों को देना है। और ये जवाब लड़कर नहीं, शांत रह कर देना है। अपने खेतों को हरा भरा रख कर देना है। उनकी हर साजिश को अपनी समझदारी से नाकाम कर देना है। जो पंजाब आतंक की गलियों को, खून से सने खेतों को, हथियारों के जखीरों को, बारूद की चिंगारियों को, घर घर जलती लाशों को, टूटती चूड़ियों की आवाजों को, उजड़ती मांगों को, अनाथ होते बच्चों के आंसूओं को बहुत पीछे छोड़ आया है, निस्संदेह आज उसे भूला नहीं है।
 
आज पंजाब भले ही खुशहाल है लेकिन जो सिसकियाँ खिलखिलाहट में बदल चुकी हैं उन्हें वो भूला नहीं है और भूलना भी नहीं चाहिए। तभी शायद वो उसकी आहट को बहुत दूर से ही पहचान चुका है। इसलिए आतंकवाद को जवाब देश का आवाम देगा, पंजाब का बच्चा बच्चा देगा।
 
डॉ. नीलम महेंद्र
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भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री दिवंगत इंदिरा गांधी अपने दृढ़ इरादों और सटीक फैसलों के लिए जानी जाती थीं। बांग्लादेश के निर्माण में उनकी भूमिका और देश को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने का उनका फैसला कुछ ऐसे कदम थे जिनसे भारत के एक ताकत के रूप में उभरने का मार्ग प्रशस्त हुआ। 19 नवम्बर 1917 में जन्मीं इंदिरा प्रियदर्शिनी ने अपने पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके लिए उन्होंने हमउम्र बच्चों को लेकर वानर सेना गठित की थी। यह वानर सेना जगह−जगह अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन करती और झंडे तथा बैनरों के साथ जंग ए आजादी के मतवालों का उत्साह बढ़ाती थी। सन 1941 में जब वह आक्सफोर्ड से शिक्षा ग्रहण कर भारत लौटीं तो आजादी के आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गईं।
 
सितंबर 1943 में अंग्रेज पुलिस ने उन्हें बिना किसी आरोप के गिरफ्तार कर लिया। 243 दिन तक जेल में रखने के बाद 13 मई 1943 को उन्हें रिहा कर दिया गया। इंदिरा 1959 और 1960 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। 1964 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया गया। ताशकंद समझौते के बाद लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया। इसके बाद प्रधानमंत्री पद की लड़ाई में इंदिरा गांधी के सामने मोरारजी देसाई आ गए। कांग्रेस संसदीय दल में हुए शक्ति परीक्षण में उन्होंने 169 के मुकाबले 355 मतों से मोरारजी देसाई को हरा दिया और इस तरह 1966 में वह देश की पांचवीं तथा पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। जिस समय इंदिरा ने प्रधानमंत्री पद संभाला उस समय कांग्रेस गुटबाजी की शिकार थी और मोरारजी उन्हें गूंगी गुडि़या कहकर पुकारते थे लेकिन जल्द ही इस गूंगी गुडि़या ने सबको चौंका दिया। 1967 के चुनावों में कांग्रेस को 60 सीटों का नुकसान हुआ और 545 सीटों वाली लोकसभा में उसे 297 सीटें मिलीं। इस कारण उन्हें मोरारजी को उप प्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री बनाना पड़ा लेकिन 1969 में देसाई के साथ अधिक मतभेदों के चलते कांग्रेस बिखर गई। इंदिरा को समाजवादी दलों का समर्थन लेना पड़ा और अगले दो साल तक उनके समर्थन से ही सरकार चलाई।
 
पाकिस्तान के साथ 1971 में हुए संग्राम में उन्होंने बांग्लादेश नाम से एक नए देश के गठन में सक्रिय भूमिका निभाई जिससे वह पूरी दुनिया में दृढ़ इरादों वाली महिला के रूप में जानी जाने लगीं और अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें दुर्गा की संज्ञा दी। अपने साहसिक फैसलों के लिए मशहूर इंदिरा गांधी ने 1974 में पोखरण में परमाणु विस्फोट कर जहां चीन की सैन्य शक्ति को चुनौती दी वहीं अमेरिका जैसे देशों की नाराजगी की कोई परवाह नहीं की। इन निर्णयों के चलते जहां उन्हें देश और दुनिया में बुलंद इरादों वाली महिला के रूप में तारीफ मिली वहीं 1975 में आपातकाल लगा देने के कारण इंदिरा को विश्व बिरादरी की आलोचना का भी सामना करना पड़ा। आपातकाल लगाने की वजह से 1977 के चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा और वह तीन साल तक विपक्ष में रहीं। 1980 में वह फिर से प्रधानमंत्री बनीं।
 
खालिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ उन्होंने आपरेशन ब्लू स्टार जैसा कठोर कदम उठाया लेकिन 1984 में उनके ही अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का कहना है कि इंदिरा गांधी भारत में बड़े पैमाने पर आतंकवाद भड़कने का अंदाज नहीं लगा पाईं। सिख उग्रवाद 1984 में स्वर्ण मंदिर में आपरेशन ब्लू स्टार के चलते भड़का। उन्होंने कहा कि इंदिरा ने जाने अनजाने एक ऐसे समय प्रक्रिया शुरू कर दी जब उनकी पार्टी ने भिंडरावाला जैसे शख्स को अकालियों से लड़ाने के लिए खड़ा किया था।
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भारत के शहरों का पुनर्नामकरण वर्ष 1947 में, अंग्रेजों के भारत छोड़ कर जाने के बाद आरंभ हुआ था, जो आज तक जारी है। कई पुनर्नामकरणों में राजनैतिक विवाद भी हुए हैं। सभी प्रस्ताव लागू भी नहीं हुए हैं।  स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पुनर्नामांकित हुए, मुख्य शहरों में हैं− तिरुवनंतपुरम (पूर्व त्रिवेंद्रम), मुंबई (पूर्व बंबई, या बॉम्बे), चेन्नई (पूर्व मद्रास), कोलकाता (पूर्व कलकत्ता), पुणे (पूर्व पूना) एवं बेंगलुरु (पूर्व बंगलौर)। आजकल उत्तर प्रदेश में शहरों का नाम बदले जाने का मामला सुर्खियां बटोर रहा है। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि शहरों का नाम बदलकर योगी सरकार हिन्दुओं के वोट हासिल करना चाहती है जबकि बीजेपी वालों को लगता है कि नाम बदल कर सिर्फ शहरों को उनकी पुरानी पहचान दिलाई जा रही है।
 
उत्तर प्रदेश के मुगलसराय स्टेशन का नाम बदल कर पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन किए जाने के बाद हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इलाहाबाद और फैजाबाद जिलों का नाम क्या बदलकर क्रमशः प्रयागराज और अयोध्या क्या किया, प्रदेश में जिलों के नाम बदले जाने की ही सियासत गरमा गई है। प्रदेश के कोने−कोने से कई जिलों के नाम बदलने की मांग उठने लगी है तो दूसरी तरफ शहरों का नाम बदले जाने का विरोध करने वाले भी मोर्चा संभाले हुए हैं। कोई आगरा का नामकरण अग्रवाल नगर या अग्रसेन के नाम पर करना चाहता है तो कोई मुजफ्फरनगर को लक्ष्मी नगर के रूप में नई पहचान देना चाहता है।
 
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में डेढ़ दर्जन से अधिक ऐसे जिले हैं जिनके नाम हमेशा विवाद का कारण बने रहते हैं। यह वह जिले हैं या तो जिनका नाम मुगल शासनकाल में बदला गया था अथवा मुगलकाल में यह जिले विकसित हुए थे। आगरा, अलीगढ़, इलाहाबाद, लखनऊ, आजमगढ़, फैजाबाद, फर्रूखाबाद, फतेहपुर, फिरोजाबाद, बुलंदशहर, गाजियाबाद, गाजीपुर, मेरठ, मिर्जापुर, मुरादाबाद, मुगलसराय, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, शाहजहाँपुर, सुल्तानपुर जैसे जिले इसी श्रेणी में आते हैं। उक्त के अलावा कुछ जिलों के नाम अप्रभंश के चलते भी बदल गये हैं।
 
जिन जिलों के नामों को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है उसमें आगरा प्रमुख जिला है। आगरा एक ऐतिहासिक नगर है, जिसके प्रमाण यह अपने चारों ओर समेटे हुए है। वैसे तो आगरा का इतिहास मुख्य रूप से मुगल काल से जाना जाता है लेकिन इसका सम्बन्ध महर्षि अन्गिरा से है जो 1000 वर्ष ईसा पूर्व हुए थे। इतिहास में पहला जिक्र आगरा का महाभारत के समय से माना जाता है, जब इसे अग्रबाण या अग्रवन के नाम से संबोधित किया जाता था। कहते हैं कि पहले यह नगर आयॅग्रह के नाम से भी जाना जाता था। तौलमी पहला ज्ञात व्यक्ति था जिसने इसे आगरा नाम से संबोधित किया।
 
मुजफ्फरनगर का नाम बदलने की सुगबुगाहट है। ये मांग भारतीय जनता पार्टी के मेरठ की सरधना सीट से विधायक संगीत सोम ने उठाई है। उन्होंने इलाहाबाद और फैजाबाद जिलों का नाम बदले जाने पर ट्वीट करते हुए कहा कि अभी तो बहुत से शहरों के नाम बदले जाने हैं। मुजफ्फरनगर का नाम बदला जाना है, मुजफ्फरनगर का नाम लक्ष्मीनगर रखने की लोगों की पहले से ही मांग है। संगीत सोम यहीं नहीं रूके उन्होंने एक और ट्वीट में कहा− मुगलों ने यहां की संस्कृति को मिटाने का काम किया है। खासतौर पर हिंदुत्व को मिटाने का काम किया है, हम लोग उसी संस्कृति को बचाने का काम कर रहे हैं। बीजेपी उससे आगे बढ़ेगी।
 
लखनऊ का नाम बदले जाने की भी चर्चा कम नहीं है। अतीत में लखनऊ प्राचीन कोसल राज्य का हिस्सा हुआ करता था। यह भगवान राम की विरासत थी जिसे उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण को समर्पित कर दिया था। अतः इसे लक्ष्मणावती, लक्ष्मणपुर या लखनपुर के नाम से जाना गया, जो बाद में बदल कर लखनऊ हो गया। इलाहाबाद जिसका हाल में नाम बदल कर प्रयाग किया गया है अतीत में प्रयाग के नाम से जाना जाता था। प्राचीन काल में शहर को प्रयाग (बहु−यज्ञ स्थल) के नाम से जाना जाता था। ऐसा इसलिये क्योंकि सृष्टि कार्य पूर्ण होने पर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ यहीं किया था, व उसके बाद यहां अनगिनत यज्ञ हुए।
 
प्रयागराज शहर का इलाहाबाद नाम अकबर द्वारा 1583 में रखा गया था। हिन्दी नाम इलाहाबाद का अर्थ अरबी शब्द इलाह (अकबर द्वारा चलाये गए नये धर्म दीन−ए−इलाही के सन्दर्भ से, अल्लाह के लिये) एवं फारसी से आबाद (अर्थात बसाया हुआ) यानि ईश्वर द्वारा बसाया गया, या ईश्वर का शहर। बीते माह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका नाम इलाहाबाद से बदल कर प्रयागराज कर दिया था। अयोध्या भारतवर्ष के उत्तरी राज्य उत्तर प्रदेश का एक नगर है। करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक भगवान राम का यहीं जन्म हुआ था। पहले इसे साकेत नगर के नाम से जाना जाता था। प्रमु राम के अलावा समाजवादी चिंतक और नेता राममनोहर लोहिया, कुंवर नारायण, राम प्रकाश द्विवेदी आदि की यह जन्मभूमि रहा है, लेकिन मुगलकाल में इसका भी नाम फैजाबाद कर दिया गया था।
 
भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा मधुदानव द्वारा बसाई गयी थी और उसी के नाम पर इसका नाम मधुपुरी पड़ा। इसको मधुनगरी और मधुरा भी बोला जाता था। शत्रुघ्न ने जब राक्षस का वध कर दिया, यह क्षेत्र धीरे−धीरे मथुरा बन गया। विष्णु पुराण में 'मथुरा' का उल्लेख है, जिससे पता चलता है कि तब तक शहर का नाम बदल चुका था। शूरसेन के शासनकाल में इसको शूरसेन नगरी कहा जाता था।
 
भगवान् विश्वनाथ की नगरी का नाम 1956 से पहले बनारस था, लेकिन बाद में उसका नाम बदल कर वाराणसी रखा गया। वाराणसी दो नदियों के नाम से जुड़ कर बना हुआ है− वरुण और असी। बनारस इन्हीं नदियों के मुहाने पर बसा हुआ है। ऋगवेद में इस शहर का नाम काशी भी लिखा गया है। वजह जो भी हो, पर लोगों को यह नया नाम अपनाने में काफी समय लग गया। पचास से अधिक वर्ष हो जाने पर भी आपको 'बनारस' या 'काशी' सुनने को मिल जाए, तो चौंकिएगा नहीं। मुगलसराय स्टेशन का नाम बदले जाने के बाद मुगलसराय जिले का भी नाम दीनदयालनगर किए जाने की चर्चा तेज है।
 
सहारनपुर के देवबंद का नाम बदलने की मांग कई बार हो चुकी है। देवबंद के बीजेपी विधायक ने तो बाकायदा यूपी सरकार से नाम बदलने के सिफारिश भी की है और कुछ दिन पहले कई जगह नाम बदलने के बैनर तक टंगवा दिए थे। इसी प्रकार अन्य जिलों के नाम से छेड़छाड़ की बात कि जाये तो इस लिस्ट में कानपुर सहित कई जिले शामिल हैं। कानपुर का असली नाम कान्हापुर और कॉनपोर तो शामली का असली नाम श्यामली और आजमगढ़ का असली नाम आर्य गढ़ एवं बागपत का असली नाम बाग प्रस्थ तथा देवरिया का असली नाम देवपुरी वहीं अलीगढ़ का असली नाम हरीगढ़ हुआ करता था।
 
-अजय कुमार
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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को राजनीति विरासत में मिली थी और ऐसे में सियासी उतार-चढ़ाव को वे बखूबी समझती थीं। यही वजह रही कि उनके सामने न सिर्फ देश, बल्कि विदेश के नेता भी उन्नीस नजर आने लगते थे।

इंदिरा गांधी एक अजीम शख्यियत थीं। उनके भीतर गजब की राजनीतिक दूरदर्शिता थी। लालबहादुर शास्त्री के बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा को शुरू में 'गूंगी गुड़‍िया' की उपाधि दी गई थी, लेकिन 1966 से 1977 और 1980 से 1984 के दौरान प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा ने अपने साहसी फैसलों के कारण साबित कर दिया कि वे एक बुलंद शख्यिसत की मालिक हैं।

इंदिरा गांधी ने परिणामों की परवाह किए बिना कई बार ऐसे साहसी फैसले लिए, जिनका पूरे देश को लाभ मिला और उनके कुछ ऐसे भी निर्णय रहे जिनका उन्हें राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ा लेकिन उनके प्रशंसक और विरोधी, सभी यह मानते हैं कि वे कभी फैसले लेने में पीछे नहीं रहती थीं। जनता की नब्ज समझने की उनमें विलक्षण क्षमता थी।

प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा का जन्म इलाहाबाद में 19 नवंबर 1917 को हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने अपनी वानर सेना बनाई और सेनानियों के साथ काम किया। जब वे लंदन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं तो वहां आजादी समर्थक ‘इंडिया लीग’ की सदस्य बनीं।

भारत लौटने पर उनका विवाह फिरोज गांधी से हुआ। वर्ष 1959 में ही उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। नेहरू के निधन के बाद जब लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो इंदिरा ने उनके अनुरोध पर चुनाव लड़ा और सूचना तथा प्रसारण मंत्री बनीं।

उनके समकालीन नेताओं के अनुसार बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स समाप्त करना, कांग्रेस सिंडिकेट से विरोध मोल लेना, बांग्लादेश के गठन में मदद देना और अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को राजनयिक दांव-पेंच में मात देने जैसे तमाम कदम इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व में मौजूद निडरता के परिचायक थे।

साथ ही आपातकाल की घोषणा, लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा प्रमुख विपक्षी नेताओं को जेल में डालना, ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसे कुछ निर्णयों के कारण उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उड़ीसा में एक जनसभा में गांधी पर भीड़ ने पथराव किया। एक पत्थर उनकी नाक पर लगा और खून बहने लगा।

इस घटना के बावजूद इंदिरा गांधी का हौसला कम नहीं हुआ। वे वापस दिल्ली आईं। नाक का उपचार करवाया और तीन चार दिन बाद वे अपनी चोटिल नाक के साथ फिर चुनाव प्रचार के लिए उड़ीसा पहुंच गईं। उनके इस हौसलों के कारण कांग्रेस को उड़ीसा के चुनाव में काफी लाभ मिला।

एक और वाकया 1973 का है। इंदिराजी कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन में भाग लेने इलाहाबाद आईं थीं। उनकी सभा के दौरान विपक्षी नेताओं ने जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किया और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। लेकिन उस जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन से इंदिराजी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई।

अपने संबोधन में विरोधियों को शांत करते हुए उन्होंने सबसे पहले कहा कि ‘मैं जानती हूं कि आप यहां इसलिए हैं क्योंकि जनता को कुछ तकलीफें हैं, लेकिन हमारी सरकार इस दिशा में काम कर रही है। इंदिराजी खामियाजे की परवाह किए बगैर फैसले करती थीं।

आपातकाल लगाने का काफी विरोध हुआ और उन्हें नुकसान उठाना पड़ा लेकिन चुनाव में वे फिर चुनकर आईं। ऐसा चमत्कार सिर्फ वे ही कर सकती थीं। इंदिरा की राजनीतिक छवि को आपातकाल की वजह से गहरा धक्का लगा। इसी का नतीजा रहा कि 1977 में देश की जनता ने उन्हें नकार दिया, हालांकि कुछ वर्षों बाद ही फिर से सत्ता में उनकी वापसी हुई।

उनके लिए 1980 का दशक खालिस्तानी आतंकवाद के रूप में बड़ी चुनौती लेकर आया। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद वे सिख अलगाववादियों के निशाने पर थीं। 31 अक्टूबर 1984 को उनके दो सिख अंगरक्षकों ने ही उनकी हत्या कर दी। गरीबी मुक्त भारत इंदिरा का एक सपना था। जो आज भी साकार नहीं हो पाया है।

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